कविता संग्रह "हमिंग बर्ड"

Thursday, November 29, 2018

मेरी कविताओं पर गीता श्री के शब्द



साहित्य के सलमान खान की तरह हैं हम सब की Geeta Shree। दबंगई के साथ संवेदनाओं को समेटे सबकी दोस्त हैं गीताश्री।
पिछले दिनों उन्होंने मेरे कविताओं पर छोटी सी पोस्ट बनाई और उसके दो दिन बाद ही आईआइसी में मिलने का अवसर मिला, तो इस पोस्ट को सहेजने के लिए मुझे इससे बेहतर ऑप्शन नहीं दिखा 😊
गीताश्री उवाच-
कथादेश के नवंबर अंक में मुकेश कुमार सिन्हा की कविताएँ मुझे अचंभित कर गई. उनके पहले काव्य संग्रह पर लिखने का सौभाग्य मिला है मुझे. तब से अब तक उनका कवि कितना परिपक्व हो गया है. मुझे पसंद आई कविताएँ. जीवन के गझिन अनुभवों से सींझ कर निकली हुई कविताएँ. कुछ चिंताएँ हैं तो कुछ प्रतिरोध के स्वर. इनमें प्रेम चुपके चुपके चमकता है... जैसे शिखरों पर बर्फ चमकती है.
पत्रिका में चार कविताएँ. कुछ अंश शेयर करती हूँ.
यह सच है कि कविताओं में हम कहीं ढूँढते हैं खुद को...
वैसे भी कुछ अच्छा लगे तो बिना आह वाह किए मुझसे नहीं रहा जाता.
अपनी फ़ितरत ही कुछ ऐसी है कि.... !!
1.
मैं भी बेवजह ही कह उठूँगा
क्या बात, आज भी उतनी ही ख़ूबसूरत !
ऐसे ही बेवजह के संवाद के मध्य
ख़ूबसूरती के बखान के साथ
संबोधित करुंगा “ मोटी”
और कभी कहूँगा “ बेवकूफ”
पर तुम खिलखिलाते हुए
इन पर्यायवाची शब्दों में ढूँढ लोगी
आत्मीयता और स्नेह !
2.
दिन बीता
अब गोधूली के पहर पर
पार्क में दूर वाले पेड़ के पीछे से
आया भोर का तारा
मध्यस्थता करने को शायद
ताकि सूरज तारे चंदा जैसे
खगोलीय नैसर्गिक पिंडों-सा
समझा जाए तुम्हें भी
उतना ही पवित्र
उतना ही प्यारा
- मुकेश कुमार सिन्हा


Saturday, October 27, 2018

🔺लाल फ्रॉक वाली लड़की🔺 समीक्षा - मुकेश दुबे




🔺लाल फ्रॉक वाली लड़की🔺
प्रेम कथाएँ : मुकेश कुमार सिन्हा
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जब यह लड़की घर आई, लग गया था पक्की शैतान मेरा मतलब चंचल है। हुआ यूँ कि जब कोरियर आया, श्रीमती जी ने पैकेट लिया (आदतन)। उनके आने के बाद से यही होता है। मेरे नाम से आने वाली डाक की स्केनिंग होकर ही आती है मेरे पास। खोला तो नन्ही-मुन्नी, छुटकू सी पुस्तक देखी। बोलीं इत्तू सी किताब....
बेटा बोला टाइटल पड़कर "फ्रॉक वाली बच्ची है.... कोई 100 किलो वाली आंटी नहीं" । 😆 
सपना जी ने भी उसकी बात से सहमत होकर कहा किन्नी प्यारी है न...... हम समझ गये अब मिलना मुश्किल है फिलहाल। उनका लाड़ जागना मतलब इंतज़ार अपनी बारी का। शुक्र है एक दिन में ही आ गई। बोधि प्रकाशन से जनवरी 18 में प्रकाशित 124 पृष्ठ वाली इस किताब का मूल्य 120 रुपये है।
लघु प्रेम कथाओं की अर्द्ध शतकीय पारी में नाबाद रहे हैं मुकेश जी। इतनी सधी हुई बल्लेबाजी (कलमकारी) हुई है कि लग रहा था इसे शतकीय पारी होना था।
छोटी-छोटी लेकिन प्रभावित करती रचनाओं में प्रेम को जिस तरह से उकेरा गया है वह सहज व स्वाभाविक लगता है। लेखक के अॉव्जर्वेशन व सेंस अॉफ ह्यूमर की तारीफ़ की जाना जरूरी है। शुरुआत में एक कविता के माध्यम से लाल फ्रॉक वाली लड़की से मुखातिब हुए और फिर शुरू हुआ सफ़र कथा का या कहिये उस मानवीय व्यवहार का जिसे मनोविज्ञान प्यार कहता है। कभी बाइक कभी रेलगाड़ी तो कभी एक्टिवा पर लरजते, सिहरते युवाओं के मध्य पनपता प्रेम जिसे बखूबी शब्दों में सहेजा है सिन्हा जी ने।

विज्ञान विषय के विद्यार्थी रहने से वैज्ञानिक शब्दावली का बेहतरीन उपयोग करते हैं आप लेखन में। संवादों में प्रयुक्त यह शब्द सौंदर्य बढ़ाने के साथ संप्रेषण को भी प्रभावी बना देते हैं। साथ ही देशज शब्दों का भी सफलता से प्रयोग किया है। थेथरई - दोस्तों की में थेथर, बे, बुरबक, जइसन शब्द गुदगुदाते हैं। दूसरी ओर विशुद्ध रूमानी अंदाज़ जैसे-
उम्मीद शायद सतरंगी या लाल फ्रॉक के साथ, वैसे रंग के ही फीते से गुँथी लड़की के मुस्कुराहटों को देखकर मर मिटना या इंद्रधनुषी खुशियों की थी, जो स्मृतियों में एकदम से कुलबुलाई। (पृष्ठ 25-मानसून)
कथा बुनने के लिये जिन दृश्यों को चुना है वे आम ज़िंदगी से उठाये लगते हैं। हाउसफुल मूवी में टिकट न मिलने से लड़के का लड़की से टिकट निकालने का कहना। लड़की की झिड़की पर बिना भड़के इंटरवल में मूंगफली लाने का अॉफर.... लड़की के होठों पर आई हँसी और वही कहावत हुई चरितार्थ 'हँसी तो.....' ।
सड़क पर कार और स्कूटर के एक्सीडेंट की परिणति प्यार भी हो सकती है और वो भी दुनिया की सबसे बेरोमांटिक जगह गैराज में.... जी हाँ। सरासर हो सकती है।
लड़की की खूबसूरती और उसके चेहरे पर दर्द का कॉकटेल बियर के गिलास से ढभकते बुलबुले की तरह लड़के पर प्यार का फुहार कर चुका था।
लड़के ने हाथ बढ़ा कर लड़की को उठाया। लड़की ने भी हलके से व्हिस्पर किया-सॉरी, ताकि भीड़ को सुनाई न पड़े।
कुछ देर बाद दोनों पास के गैरेज से कार और स्कूटर ठीक करवा रहे थे, बिल मध्यम आय वर्गीय लड़के ने अपने क्रेडिट कार्ड से पे किया।
पनप गया था कुछ उस टक्कर में जो स्टील के गिलास में लस्सी पीते हुए पल्लवित हो रहा था। (मरखड़ गैया-पृष्ठ 101)
कुल मिलाकर इस संग्रह की हर एक कहानी पाठक का ध्यान आकृष्ट करती है और अंत में छोड़ जाती है मीठी सी मुस्कान। रेनिंग विथ कैट्स एन डॉग्स, नोटबंदी, क्रश, पाइथोगोरस प्रमेय, व्हाई शुड बॉयज हेव अॉल द फन, इनबॉक्स भी इस संग्रह की लाजवाब कहानियाँ हैं।

हल्के-फुल्के मूड की, कुछ चुलबुली कुछ शांत सी प्रेमरस में पगी कहानियाँ जिन्हें पढ़ते हुए उम्र का वो मोड़ याद आता है जिसके लिये किसी शायर ने कहा है -
मोड़ होता है जवानी का सम्हलने के लिए,
लोग इस मोड़ पर आकर फिसलते क्यों हैं ?
मगर रपटने, फिसलने का मजा भी अलग होता है..... मुकेश कुमार सिन्हा जी इस बेहतरीन लेखन के लिए ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएँ।

©मुकेश दुबे

करुणावती साहित्य धारा के अक्टूबर वार्षिकांक में मेरी एक शुरुआती दौर की कविता "बीड़ी बनाते बच्चे" ।

Friday, September 14, 2018

सफ़र ब्लॉग का ......


बात 2008 की थी, उन दिनों ऑरकुट का जमाना था, तभी एक नई बात पता चली थी कि "ब्लोगस्पॉट" गूगल द्वारा बनाया गया एक अलग इजाद है, जिसके माध्यम से आप अपनी बात रख सकते हैं और वो आपका अपना होगा | जैसे आज भी कोई नया एप देखते ही डाउनलोड कर लेता हूँ, तो कुछ वैसा ही ब्लॉग बनाना था। दीदी ने बताया था ब्लॉग भी गूगल की एक फेसिलिटी है जो एक तरह से इंटरनेटीय डायरी सी है। पहली पाठक भी वही थी।
ये सच्चाई है कि ब्लॉग के वजह से ही हिंदी से करीबी बढ़ी, टूटे फूटे शब्दों में अपनी अभिव्यक्ति को आप सबके सामने रखने लगे। ये भी सच है पर कि इन दिनों ब्लॉग पर जाना कम हो गया है, फेसबुक पर संवाद ब्लॉग के तुलना में थोडा श्रेयस्कर है। फिर ये भी सच है कि आज भी ब्लॉग्स पर जाना बंद नहीं हुआ है। आज भी मेरा लिखा सब कुछ ब्लॉग पर देर सवेर पोस्ट होता है, बेशक हर रचनाकार के तरह उनको कागज़ पर प्रकाशित होना देखना चाहता हूँ ! पर मेरा ब्लॉग मेरे साहित्यिक जीवन की अमूल्य थाती है।
ये भी आज की सच्चाई है कि बहुत से नामी गिरामी साहित्यिक ब्लोग्स के बीच चुप्पी साधे मेरा ब्लॉग "जिंदगी की राहें" अपने पाठक संख्या में उतरोत्तर वृद्धि को दर्ज होते देख पा रहा है ! मेरा दूसरा ब्लॉग "गूँज...अभिव्यक्ति दिल की" है।
आंकड़े बताते हैं कि एक समय करीब 200 कमेंट्स तक पोस्ट पर आवागमन होता था जो किसी सामान्य हिंदी पत्रिका से कम नहीं था। आज भी ट्रैफिक की संख्या बताती है साइलेंट पाठक की संख्या में इजाफा हुआ है पर लोग प्रतिक्रिया देने से हिचकिचाते हैं।
अपने 376 फोलोवर्स की संख्या के साथ हिंदी दिवस पर इस ब्लॉग ने कछुए के चाल के साथ अपने पाठक के संख्या (viewers) को करीबन साढ़े चार लाख छूते हुए देख रहा है जो बहुत से सामूहिक ब्लॉग् मैगजीन के तुलना में भी बहुत आगे है, पिछले वर्ष हिंदी दिवस के ही दिन ये संख्या तीन लाख से ज्यादा थी | हर दिन करीबन 500 पाठक इस ब्लॉग पर आते हैं| तो इन वजहों से आज धीरे से कह पा रहा है कि गिलहरी के मानिंद हम भी साहित्यिक पुल को बनाने में लगे हैं।
इसी ब्लॉग से बने आकर्षण के वजह से आज मेरे हिस्से में भी एक कविता संग्रह "हमिंगबर्ड" एक लप्रेक संग्रह "लाल फ्रॉक वाली लड़की" और छः साझा संग्रहों - कस्तूरी, पगडण्डीयाँ, गुलमोहर, तुहिन, गूँज और 100कदम का सह संपादन (अंजू चौधरी के साथ) है | करीबन 300 नए/पुराने साथियों को अपने साझा संग्रह के माध्यम से प्रकाशन का सुख दे पाए, जिसकी पहुँच भी ठीक ठाक रही | अब एक नया साझा संग्रह "कारवां" के नाम से लाने की पूरी योजना है, जो बस कार्यान्वित होने ही वाली है | हिंदी से जुड़े अधिकतर पत्रिकाओं ने कभी न कभी कागज़ का कोई एक कोना मेरे नाम भी किया है | आल इंडिया रेडिओ/आकाशवाणी के माइक के सामने अपनी आवाज रख पाया हूँ |
तो इन सबसे इतर बस ये भी जोर देकर कहना है - हाँ, इस ब्लॉगर के अन्दर छुटकू सा हिंदी वाला दिल धड़कता है, जो हिंदी की बेहतरी ही चाहता है
हिंदी दिवस की शुभकामनायें !
~मुकेश~


Saturday, August 18, 2018

किताब_समीक्षा_लाल_फ्रॉक_वाली_लड़की



लेखक : मुकेश कुमार सिन्हा
श्रेणी : लप्रेक (लघु प्रेम कथा) संग्रह
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)
कीमत : ₹100
किताब के बारे में कुछ कहने से पहले ‘दो शब्द’ इस किताब के लेखक और मेरे मित्र ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ के बारे में कहना चाहती हूँ जिन्हें माँ शारदे से कलम का वरदान प्राप्त हुआ है इसलिये कविता लिखे या कहानी सब में अपना विशेष प्रभाव डाल देते हैं जो इनकी अपनी पहचान हैं बोले तो आम बोलचाल के साधारण शब्दों को इस तरीके से बड़े ही रोचक अंदाज में प्रस्तुत करते कि उनसे आँखों के समक्ष चित्र तैरने लगते हैं । यही तो एक कुशल कलमकार की ख़ासियत होती कि उसके लिखे को पढ़ने पर पन्नों के अक्षर मानव आकृति धारण कर लेते और जो कुछ भी हम पढ़ते वो हमें अपने आस-पास घटता हुआ महसूस होता जिससे कि हम उससे जुडाव महसूस करने लगते और ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ इस कला के जादूगर है जिनकी कलम से निकलकर अल्फाज़ जीवंत चित्रों में परिवर्तित हो जाते है । उनके लिखे काव्य-संग्रह ‘हमिंग बर्ड’ को पढ़कर भी कुछ ऐसा ही अहसास हुआ और ‘फेसबुक’ पर भी वे जो भी लिखते उसमें हमेशा कुछ नवीनता और अनोखापन होता क्योंकि, वे असामान्य से लगने वाले विषयों व शब्दों का इस तरह साधारणीकरण करते कि उनका मिजाज बदल जाता याने कि उनमें ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ का फ्लेवर आ जाता तो वे अद्भुत लगने लगते है । उनके इस ‘फ्लेवर’ का स्वाद आप इस कहानी संग्रह में भी ले सकते हैं जिसे पढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी बार होंठों पर मुस्कराहट तैर गयी और न जाने कितनी दफा ऐसा लगा जैसे कि ये सब कुछ सबके साथ ही होता पर कुछ ही इसे इतने अनोखे तरीके से व्यक्त कर पाते जिसमें ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ जिन्होंने प्रेम के छोटे-छोटे पलों को कहानी में बांधकर ये गुलदस्ता बनाया जिसका नाम ‘लाल फ्रॉक वाली लड़की’ है ।
‘सफ़र’ कहानी से प्रेम का आगाज़ होता हैं जो किसी दूसरे पल में यात्रा के दौरान महसूस करता है ‘इश्क़ में शहर हो जाना’ वास्तव में होता क्या है । जब रिश्तों की डोर पुकारती हो तो आँखों में आये आंसू बेसबब नहीं होते ‘मानसून’ की तरह जिसकी वजह ‘तृतीय प्रेम सिद्धांत’ भी हो सकती है ये आगे आकर पता चलता जब हम अगली कहानी पर पहुँचते है । ‘परीक्षा’ प्रेम की हो जब, तब शत-प्रतिशत पास होना कितने मायने रखता ये इस कहानी को पढ़कर ही पता चलता जो ‘ओनली फ्रेंडशिप’ की तरह विखंडित नहीं होती । आगे पन्ने पलटे तो किसी हिट फिल्म के ‘हाउसफुल’ शो में हुई मुलाकात का सिरा ‘कक्षा-९, सेक्शन-बी की छठी घंटी’ से जुड़ जाता हैं । कुछ प्रेम सिगरेट की तरह सेहत के लिये हानिकारक होते है और ‘क्लासिक माइल्ड’ के धुंए की तरह भीतर-ही-भीतर अंतर को सुलगाते है और ऐसे में याद आती ‘थेथरई-दोस्तों की’ तो उदास चेहरे पर भी मुस्कान आ ही जाती है । कभी-कभी यूँ भी होता कि जो हमें प्रेम नजर आता वो नजरों का धोखा होता जिसका अहसास तब होता जब वो किसी ‘मेट्रो’ स्टेशन पर उतर जाता और ‘ब्लड-डोनेशन कैंप’ में बैठकर लड़का किसी तरह अपने गम को भूलाने सुंदर नर्स को देखकर अपने मन को समझाता है कि सफ़र में प्रेम से बचना चाहिये अखिरकार, परदेसियों को तो कहीं न कहीं साथ छोड़ना ही है । ‘आल बिहार क्विज चैंपियनशिप’ जैसी प्रतियोगिता में रनरअप बनकर जिस लडकी की वजह से विनर बनते-बनते बचा वही उसे आखिर में विजेता होने का गौरव महसूस कराती है । प्रेम दूर-दूर रहकर भी पास-पास लगता जब प्रेम दिल के करीब होता तब कभी-कभी मन में भी अप-डाउन चलता रहता ‘दूर-दूर, पास-पास’ लव मी, लव मी नॉट की तरह और कोई सीनियर ऑफिसर किसी जूनियर से इमोशनली ‘ब्लैकमेल’ हो जाती सिर्फ़ इश्क़ की खातिर और कहीं कोई ‘इनबॉक्स’ में प्रेम पा जाता तो कहीं बस में टिकट खरीद ‘गिव एन टेक’ करते-करते दिल भी आदान-प्रदान कर दिया जाता और ये ‘तालमेल’ आपसी सोच का होता जहाँ ‘फैंटेसी’ महज़ एक स्वप्न ही होती है ।
प्रेम कथाएं बेशक छोटी-हो, इकतरफ़ा हो पर, उनकी ‘स्मृतियाँ’ गुदगुदी होती एक ‘अमरुद का पेड़’ भी प्रेम के लिये उत्प्रेरक का काम कर सकता है और एक ‘इंजन’ रूपी लड़के को कोई कुशल महिला ड्राईवर मिल सकती तो ‘व्हाई शुड बॉयज हेव आल फन’ की टैग लाइन लगाये कोई टीन ऐज लडकी किसी प्रोढ़ को अंकल कहकर न केवल उसका दिल साथ ही सपना भी तोड़ सकती है । फोर्टी प्लस में सोना चाँदी ‘च्यवनप्राश’ प्रेम को बल देता वैसे तो ‘प्रेम टीचर’ नहीं होते पर, जिन्हें चाहे हम ये दर्जा दे सकते ज्यादातर मामलों में तो ‘प्रेम’ ही ‘टीचर’ होता जो जीवन के महत्वपूर्ण सबक देता । बचपन में तो ‘कंचों का व्यापार’ करते हुये कोई प्रेम पनप जाता जो अंततः ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ की तरह सिद्ध हो जाता और टीन ऐज तो ऐसी जिसमें हर किसी का कोई न कोई ‘क्रश’ होता पर, किसी का ही सक्सेस होता लेकिन, जिनका फ्लॉप होता वो भी कहाँ भूल पाते जब-तब उन दिनों की जुगाली करते रहते जब कभी किडनी ‘ट्रांसप्लांट’ के साथ हार्ट भी एक्सचेंज हो गया था । एक दिन किसी सुहाने मौसम में लॉन्ग ड्राइव के इरादे से यूँ ही ‘एनफील्ड बुलेट की यात्रा’ पर निकल जाते कि किसी अजनबी हसीना को लिफ्ट देकर कुछ हसीन पल बितायेंगे मगर, जब हसीना मिली तो मन ही बदल गया ये मन भी साला, बहुत बड़ा नौटंकी है । ‘रेनिंग विथ कैट्स एंड डॉग्स’ एक इत्तेफाक था पर, उसने एक नासमझ लडके को एकाएक ही समझदार व जिम्मेदार बना दिया था । ‘मांझी-द माउंटेन मैन’ फिल्म भले न देख पाये पर, जिंदगी ने जो दिखाया उससे पाया कि उम्मीद सिर्फ़ मांझी से ही होती है । ‘कॉलेज क्लास रूम’ में फिजिक्स-केमेस्ट्री की क्लासेस भले लग जाये पर, इन्हें पढ़ने वालों की केमिस्ट्री बड़ी मुश्किल से मिलती है जब गलतफहमियां क्लियर होती तब ‘क्विज चैंपियनशिप’ हारकर प्रेम की बाज़ी जीतने का मज़ा तो प्रेमी ही जानते है । बनारस की गलियों में एक अनजान अपना एग्जाम सेंटर ही नहीं अनायास ‘प्रेमिका’ भी खोज लेता और ‘माली’ बनकर ताउम्र प्रेम बगिया सींचता है ।
‘H2O’ में कौन हाइड्रोजन और कौन ऑक्सीजन का अणु ये भले समझ नहीं पाते पर, दो अजनबी खुद पानी की तरह आपस में घुल-मिल जाते है । सिगरेट के धुएं के छल्ले में अपनी प्रेमिका की छवि देखना या ‘प्रेम प्रतीक’ बनाकर अपने प्रेम के बारे में सोचना या फिर ‘जानी दुश्मन’ जैसी हॉरर मूवी दिखाकर अपने प्रेम को नजदीक लाना ऐसा बहुत कुछ आम जीवन में होता जो कालांतर में लप्रेक का कथानक बन जाता है । कभी कोई लड़की ‘मरखड़ गैया’ सी अचानक ही आ जाती जीवन में और बन जाती सीधी-नेक अल्लाह की गाय सरीखी तो कभी-कभी प्रोढ़ावस्था में ‘अनुलोम विलोम’ करते किसी प्रोढ़ पर योग से अधिक मुस्कान असर कर जाती तो वो खुद को जवान महसूस करने लगता है । नोटबंदी जैसे आपातकाल में भी प्रेम कहानियां लिखी जा सकती हैं वो भी एक नहीं तीन और तीनों ही बेहतरीन जहाँ ‘एक’ में पुराना प्रेम पिंक नोटों की तरह गुलाबी हो गया तो ‘दो’ में नया प्रेम शुरू होकर ‘तीन’ में परवान चढ़ गया गोया कि एक, दो, तीन अलग-अलग कहानियां नहीं प्रेम की थ्री स्टेप्स है । यूँ तो मेले प्रेम कहानियों के लिये मुफ़ीद स्थान होते पर, ‘पुस्तक मेला’ भी मन में कोई प्लाट बना सकता हैं क्या ? पर, जब लेखक ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ हो तो अपनी ‘हमिंग बर्ड’ के प्रमोशन के जरिये दूसरे के दिल को धड़का भी सकते है बिना संवेदनाओं के लेखक होना आसान भी तो नही वरना, ‘एक शाम’ दो प्रेमियों के बीच की दूरी किस तरह कर पायेगी और प्रेमिका अपने कंजूस प्रेमी को अपनी पहली सैलरी से ट्रीट देने की ख़ुशी की तरह बटोर पायेगी । ‘भैया की शादी’ हो और भाभी की छोटी बहनिया दिल न चुराये ये तो हो नहीं सकता जनाब पर, हीरो तो अपनी हीरोइन के ‘सुनिये’ कहने का ऐसा दीवाना हुआ कि सुध-बुध भूला बैठा कमबख्त होश आया भी तो तब, जब उसके बच्चे उसे मामा कह रहे थे । उफ़, ये ट्रेजेडी किसी के भी साथ न हो कि आपके बड़े भाई आपसे आपके प्रेम को मिलवाने का वादा करें पर, जब वक़्त आये तो वो ‘अप्रैल फूल’ बना जाये । ऐसा शायद, कोई नही जो संडे का इंतजार न करता हो देर तक सोने के लिये आखिर, वही तो संडे का पर्याय हैं पर, कभी-कभी कुछ ऐसी घटनायें एक के बाद एक लगातार होती जो अहसास कराती कि ‘इतवार भी शनिच्चर हो सकता है’ ऐसे में प्रेम का मखमली स्पर्श ही जख्मों पर मरहम लगाता है ।
‘मुकेश कुमार सिन्हा’ विज्ञान गणित से स्नातक होते हुये भी प्रेम जैसे विषय में पी.एच.डी. किये मालूम होते है जो किसी भी परिस्थति, किसी भी घटना या स्थान में ‘प्रेम’ ढूंढ लेते है और उनके इस लघु कथा प्रेम संग्रह ‘लाल फ्रॉक वाली लड़की’ में सर्वत्र प्रेम बिखरा हैं । इसमें आपको लव का हर फ्लेवर चाहे वो नमकीन हो या चटपटा या फिर खट्टा-मीठा या रसीला मिला जायेगा शोर्ट में बोले तो यह लव स्टोरीज का चटाकेदार पैकेट हैं जिसे खरीदकर पढ़ने पर मनचाहे जायके की फुल गारंटी है ।
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०८ अगस्त २०१८


Saturday, August 4, 2018

"कुत्ते की दुम" --


“कुत्ते के दुम हो तुम”, कभी सीधी नहीं हो सकते !!
उफ ! हर दिन अपने लिए अँग्रेजी के शिक्षक से ये खास वक्तव्य सुन कर थेथर से हो गए थे । कितना बुरा लगता था, अँग्रेजी के शिक्षक हो कर भी उनसे हिन्दी में कुछ सुनना। काश ! अँग्रेजी में ही कोई खतरनाक सी गाली देते जिससे कि हम अपनी मैया को भी शान से बता पाते, ताकि मैया भी बिना सोचे समझे हुए कह देती, वाह !! अब लग रहा है तुम्हें ट्यूशन पर भेजने से पैसा व्यर्थ नहीं जा रहा है। पर स्साला ! कुत्ते का दुम !! कितना शौक से मैया अँग्रेजी ट्यूशन पर भेजने के लिए बाबा से लड़ी थी, फिर पर्मिशन मिला था, ताकि ग्रामर ठीक होने के बाद मैं भी बाबा के तरह अँग्रेजी में फूँ फाँ कर पाऊँगा। पर अपन तो “माय नेम इस ..........” और “आई एम एट इयर्स ओल्ड” से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे थे।
एक दिन तो हमने सर को प्यार से समझाने की कोशिश भी कि, सर मैं तो ईडियट, नॉनसेन्स जैसा कुछ हूँ, ये कुत्ते का दुम तो वो शिवम हो सकता है । पर काहे समझेंगे सर!! उनको तो बस जब तब मैं ही कुत्ते के दुम जैसा टेढ़ा दिखता था। नाउम्मीदी के दरिया में बह रहा था।
आखिर एक दिन ट्यूशन से लौटते हुए अपने अजीज मित्र शिवम को बोला – यार, एक काम करें, आज ट्राय मारें ??
शिवम – अबे, कईसन ट्राय मारेगा ? बेटा ठुकाई हो जाएगी, देख लेना, अपने क्लास की सारी लड़कियां चन्ठ हैं।
यार! लड़की-वड़की नहीं, तुम भी साले बस् एक ही तरफ देखते हो। अबे, ये मास्साब रोज हमको कुत्ते का दुम कहते हैं, जो सीधा नहीं हो सकता। स्साला ! हाथी, घोडा, बाघ, शेर ... इतना सारा जानवर है, उनसे तुलना करते तो खुशी भी हो, कुत्ता तक भी गिरा कर लाते तो भी खुद को समझा लेते, इस्स, उस मुड़े, पीछे से जुड़े “दुम” जैसा बना दिया इस मुए सर ने ।
“आज ट्राय करते हैं, क्या कुत्ते का दुम सीधा हो सकता है या नहीं।“
शिवम ठहरा मेरा मित्र, मेरे से सीनियर बकलोल, बड़ी मासूमियत से मुंडी हिलाते हुए मुस्कुरा दिया। उसे लगा मैं बेवकूफ, खुद मे बदलाव लाने के लिए कोई गूढ मंत्र उससे शेयर करने वाला हूँ। हाय! इस मासूमियत पर कौन न मर जाए, तभी तो मेरे जैसे मंद बुद्धि ने ढूंढ कर एक दोस्त रखा था, जो मेरी हर बकलोली पर मुसकुराता और मैं उसकी सहमति समझता। वैसे बाद में उसको भी समझ में आ गया था कि मेरी खोपड़ी मे क्या चल रही है।
हम दोनों ने अपने घर के बाहर ही एक बिलबिलाते हुए पिल्ले को पकड़ा, उसके दुम को पकड़ कर सीधी की और चीख पड़े, लो हो गई सीधी, ये मारा पापड़ वाले को, स्साला ये मास्टर साब ही बुरबक हैं। उफ! पर जैसे ही पिल्ले को जमीन पर उतारा वो तो फिर से टेढ़ी की टेढ़ी, गोल घूम गई। हाय मर जावां !!
अब तो कोई जुगाड़ लगाना पड़ेगा, शिवम ने सुझाया, इसकी पुंछ को एक छोटे से खपची से बांध देते हैं, कुछ दिन मे सीधी हो जाएगी, देखा नहीं था वो भैया को, जो हाथ मुड़ गया था, तो खपची से बांधे थे।
बेचारा पिल्ला !! सर के बोले गए “कुत्ते के दुम” के वजह से शहीद होने वाला था। हमने दो पतली छोटी बांस की खपची में उसके दुम को दबा कर, बड़े प्यार से मानवता और दयालुता दिखाते हुए ऊन से बांध दिया वो भी रुई डालकर, ताकि दर्द कम हो। बंधने के बाद, वो कू-कु करता हुआ ओझल हो गया, हमने भी खुद को समझाया, कुछ घंटो का दर्द है, अब इतना तो दर्द उसको सहना चाहिए, आखिर मेरे इज्जत का सवाल है। उसकी दुम सीधी हो कर रहेगी, फिर सर को कहेंगे, अँग्रेजी मे गालियां दिया कीजिये।
हाय वो रब्बा। एक आध घंटे के बाद ही वो पिल्ला फिर से दिखा, पर खपची निकल चुकी थी, कैसे क्यों निकली, ये तो जांच का विषय था। और दुम – उफ!! मेरी तरह टेढ़ी की टेढ़ी।
तो अंततः हमने खुद को समझाया! सर ही सही थे, फिर शिवम भी तो बोल उठा – तू सच मे कुत्ते का दुम है। टेढ़े का टेढ़ा। पर “टेढ़ा है पर मेरा है”, ये भी तो एक एड-लाइन है।
तो जैसे मास्साब, शिवम, मैया सब झेलते रहे मुझे, आप भी झेलिए ........ !! बेशक जो भी कह दीजिये !!
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लीजिये झेलिए, और हाँ, पक्का पक्का बताइये कइसन लगा :) :)
~मुकेश~

Friday, June 1, 2018

’लाल फ़्रॉक वाली लड़की’ – समीर लाल 'समीर' के शब्दों में

Setu ....................... सेतु: ’लाल फ़्रॉक वाली लड़की’ – मुकेश कुमार सिन्हा: किताब: ‘ लाल फ़्रॉक वाली लड़की ’ लेखक: मुकेश कुमार सिन्हा मूल्य:  ₹ 120 रुपये प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)



'लाल फ़्रॉक वाली लड़की' – मुकेश कुमार सिन्हा

किताब: ‘लाल फ़्रॉक वाली लड़की
लेखक: मुकेश कुमार सिन्हा
मूल्य:  ₹ 120 रुपये
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’


हालांकि मुकेश कुमार सिन्हा 2008 से ब्लॉगर मित्र रहे हैं मगर जैसा मुझे ख्याल आता है वह सही  तरह से सक्रिय सन 2010 में आकर हुए और तभी से उनको ब्लॉग के माध्यम से नियमित पढ़ना शुरु किया। अतुकांत एवं छंदमुक्त कविताओं के माध्यम से वह दिल कहने की कला में पारंगत रहे हैं। अतुकांत कवितायें दिल के भावों की अभिव्यक्ति को जस का तस प्रस्तुत करती हैं बिना किसी भाषाई एवं व्याकरण साधने की मिलावट के। शायद इसीलिए मुझे यह ज्यादा प्रभावित करती हैं। यूँ तो भाषा से समृद्ध एवं व्याकरण में पारंगत लोग उतनी ही सरलता से गीत, गज़ल और छंदबद्ध कविता में भी भाव उतार देते हैं।

समीर लाल 'समीर'
कुछ वक्त पहले मुकेश ने अपना कविता संग्रह ‘हमिंग बर्ड’ भी मुझे भेजा था। एक ही बार में सारी कवितायें पढ़ गया था मगर तारीफ के शब्द ईमेल तक सीमित होकर रह गये थे। कभी इत्मीनान से बैठकर किताब के बारे में विस्तार से लिखेंगे का विचार आलस्य के कुचक्र में फंसकर अन्य अनेकों कार्यों के साथ पेण्डिंग फाइल में रखा हुआ है। सरकारी पेण्डिंग फाइलों का सा उनका भी हाल न हो जाये कि सदा के लिए उसी फाईल में दफन होकर रह जायें। कुछ खुद को व्यस्थित कर अनुशासित करना होगा उन्हें दिन की रोशनी में लाने के लिए।
इस बीच उनकी नई किताब आ गई ‘लाल फ़्रॉक वाली लड़की’। मुकेश हमेशा से मुझे परिवार के बड़े सदस्य का दर्जा देते आये हैं और पिछली किताब के साथ पूरा इन्साफ न करने के बावजूद भी उन्होंने पुनः अपनी यह नई किताब मुझे उपलब्ध करवाई।

मित्र रविश कुमार की एक किताब आई थी ‘इश्क में शहर होना’। लप्रेक याने लघु प्रेम कथाएँ थी उसमें। कभी मौका नहीं आया कि पढ़ पाऊँ हालांकि रविश फोन पर वादा करके दिल्ली में उस पते पर पहुँचवाना भूल गये जहाँ से मुझ तक पहुँच पाती। मगर उनके विडियो के माध्यम से किताब का एक बड़ा हिस्सा सुना है।
छोटी-छोटी प्रेम कथायें रोजमर्रा की जिन्दगी से। कभी सड़क पर चलते, कभी मेट्रो में तो कभी रेल से गाँव जाते राह में, बहती हुए भावनायें और हसरतों भरे मोहब्बत के किस्से, यही तो है मुकेश की इस नई किताब ‘लाल फ़्रॉक वाली लड़की’ में भी।

मुकेश कुमार सिन्हा
छोटे-छोटे से 50 से 100 शब्दों के किस्से, आशिक दिल के, पढ़ते-पढ़ते आप बेवजह मुस्करायेंगे, उदास हो जायेंगे, खुद ही अहसास जगायेंगे किसी बीते लम्हे का और बेसाख्ता कह उठेंगे, अरे! ये तो मेरा किस्सा है, और फिर एकाएक जानेंगे कि यह तो हर उस दिल का किस्सा है जिसे सही मायने में धड़कना आता है। जगह जगह ऐसे शब्द आप पायेंगे जिसे आप जानते तो हैं, बोलते भी हैं कभी कभी मगर कोई उन्हें इतनी खूबसूरती से लिख जायेगा, यह शायद आप नहीं सोचते होंगे, इसका एक उदाहरण देखें:
‘थेथरई दोस्तों की’,
कॉलेज के दिनों में कितने थेथर होते थे न दोस्त!
कमीने, साले। चेहरा देखकर व आवाज की लय सुनकर भाँप जाते थे कि कुछ तो पंगे हैं।
-क्या हुआ? काहे मुँह लटकाए हुए हो रे?
उसके घर में चाय के लिए नहीं पूछा क्या?

इसके आगे फिर आम बातचीत के लहजे में बिना रुकावट के अंग्रेजी शब्दों की मिलावट को मंजिल देते हुए कहते हैं कि तभी तो वह प्रेम से लबरेज सामान्य बातचीत बाद के दिनों में सिहरन भरती हैं।

ट्रिगनोमेट्री, फिजिक्स, केमिस्ट्री जैसी बातों से मोहब्बत का गणित और इजहार, किस्सागोई का एक अलग लयात्मक अंदाज कि मात्र 4 बाई 6 के 104 पन्नों में पसरा मोहब्बत का पूरा संसार,  आज के ट्वेन्टी ट्वेन्टी क्रिकेट के जमाने को चरितार्थ करता आपको रोमांचित करेगा, यह दावा है। किताब यूँ तो 124 पन्नों की है मगर पहले के 20 पन्ने भूमिका और साहित्यकारों के विचारों के हैं इस किताब के बारे में।

‘रेनिंग विथ केट्स एण्ड डॉग्स’ , ‘नोटबंदी’, ‘क्या इतवार भी शनिचर हो सकता है’ जैसे रोचक शीर्षक और उनमें समाहित इश्क की बातें, मोहब्बत दिल के किस्से हैं, मुकेश शब्द सजाना जानते हैं, उनको पिरोना जानते हैं, फिर वो चाहे गध्य हो या पध्य में, माला सुन्दर सजकर आयेगी ही। आप अहसासेंगे कि आपने यह माला खुद पिरोई है खुद के लिए।

इसे पढ़ते पढ़ते मुझे याद आया कि मेरी भी लप्रेक (लघु प्रेम कथाएँ) संग्रह उसी पेंडिंग फाईल में है। धन्यवाद मुकेश का कि उसने याद दिलाया, जल्द काम शुरु करते हैं उस पर। तब तक आप जरुर पढ़ें: ‘लाल फ़्रॉक वाली लड़की’। मेरा वादा है आप निराश नहीं होंगे और पायेंगे कहीं न कहीं खुद का कोई किस्सा।

Monday, April 30, 2018

आज का समय : आलोचना का समय

सच्चाई कहूँ तो हमे आजकल सिर्फ आलोचना करना आ गया है, हम सबने पहले से तय कर लिया की हमारी आँखे क्या देखेगी, हम किसको किस हद तक गिराना चाहते, किसको किस हद तक गिरा हुआ देखने के बावजूद उसमे देवत्व देखेंगे, ये भी हमने सोचा हुआ है|
हम सबने अपनी संवेदनाओं को भी इस तरह से मुट्ठी में बांध लिया कि मृत्यु/बलात्कार तक में नाटक नजर आता है, हम कौड़ियों में उछलने लगते हैं , हम स्त्री विमर्श के लिए झंडा उठाते हुए चुपके से अपने आगे खड़ी स्त्री को ही चिकोटी काट लेते हैं । हम साथ साथ हैं ये दिखाते हुए एक दूसरे के हथेलियों को बेशक पकड़े रहें पर व्हिस्पर करते हुए चिल्ला देते हैं मेरे झंडे की लंबाई तुमसे अधिक है, या झंडे के रंग पर ही छीछालेदर करने लगते हैं।
नाटक की पटकथा कितनी फिल्मी सी हो गयी है न, बड़ेबड़े तीसमारखां टाइप अभिनेता भी अपने पक्ष को बड़े प्यार से सिद्ध कर देते हैं और हम जोर लगाकर हाइसा के तर्ज पर चिल्ला उठते हैं ठीके बोले ।
अजी गोली मारिये, हम तो जी रहे, जीते रहेंगे पर स्वयं को तो ऐसे स्थिति में कमतर तो मत कीजिये जिससे कभी खुद रोएं तो हम स्वयं को समझाने लगे कि अरे मैं तो नाटक कर रहा था।
समय कठिन है, पहले जागरण देवी माँ के आराधना के लिए होता था अब ये भी अपने हिसाब से जयकारा लगाते हैं।
हाँ, दुसरे के दर्द में खिलखिलाहट ढूंढने वाले हम फेसबूकिया सिर्फ अपने संवेदनाओं को मरते देख रहे, और कुछ नहीं बदलने वाला ........... !
मरिये, सब मरेंगे, पता नहीं मरने की वजह क्या हो, कब हो और क्यों हो ! शोक सभा में भी आत्मा की शांति के बदले इनदिनों नजर घड़ी पर रहती है तीन मिनट बोलकर 30 सेकंड में सभा समाप्त हो जाता है।
सॉरी बॉस, हर नाटक का पटाक्षेप हम क्यों करें, समय हर घाव को दाग भर देखता है, पर हर दाग अच्छे हों जरुरी नहीं .........साथ ही याद रखियेगा, देश भी माँ है और स्त्री विमर्श का झंडा जिसके लिए उठाये वो भी स्त्री यानी मां और जिसको चिकोटी काटे वो भी मां....!! सोचना ये है कि हमें कहाँ रहना चाहिए। सोचना तो हर के को पड़ेगा ही, स्त्रियों को भी .......... !
~मुकेश~