कविता संग्रह "हमिंग बर्ड"

Friday, February 19, 2021

चाय की चाह



चाय के मीठे घूंट की शुरुआत मैया के पल्लू को दांतों में दबाये, उसके होंठों से लगे स्टील के ग्लास को उम्मीदों के साथ ताकने से हुई। फिर ये रूटीन कब फिक्स हो गया याद नहीं कि मैया के चाय के ग्लास के अंतिम कुछ घूंट पर मुक्कू का नाम रहेगा। शायद कभी एक दो बार मैया से गलती हुई और खाली ग्लास जमीन पर रखने पर उसको लगा, उफ्फ्फ ये क्या हुआ, भूल गयी। फिर हमने भी अपने रोने के सुर का वेवलेंथ इतना तेज किया कि उसके कंपन से पूरा घर सहित मैया भी कांप गयी व उन आंसुओं के धार में बहने लगी चाय की जरूरत| फिर तो एक छोटा सा कप या बचपन वाली छोटे स्टील की ग्लास में मेरे नाम का भी चाय बनने लगा, कभी कभी उस चाय के साथ एम्प्रो या मिल्क बिकीज का बिस्किट भी हुआ करता । वो अलग बात है कि इतने शुरुआती दौर से चाय का शौकीन होने के बाबजूद मन यही कहता कि "चाय ऐसी चाहिये जो दूधगर मिठगर होए" यानी अधिक दूध और होंठ चिपकने लायक मीठी चाय ही गांव में रहने के दिनों में पसन्द हुआ करती थी 😊
कॉलेज के दिनों में , सुबह-सुबह घर में बनी चाय के बदले सड़क तक जाकर अपने दोस्त खुर्शीद के छोटी सी दुकान से उसकी बनाई चाय और बिस्किट का मजा लेना भी अजीब नशा था, मुझे अभी भी लगता है उतनी शानदार चाय और कहीं नहीं पी, लगातार उबलते दूध की वो सौंधी महक नहीं भूलने लायक थी । साथ ही, बेवजह की पॉलिटिकल बहस भी यादगार हुआ करती थी। आजकल बड़ा आदमी हो गया मेरा ये चाय वाला दोस्त 😊
उन्हीं दिनों कॉलेज के सामने की झोपड़ी में मौसी की बनाई उफ्फ्फ वो, सबसे घटिया चाय 😊 जो खूब सारी चीनी, और धुएं के वजह से बनती थी और समोसा भी दिल के बेहद करीब था क्योंकि कोयले के धुँए में उबली चाय जैसा कुछ, को हम क्यों पीते थे पता नहीं, पर उस चाय के सहारे दूर तलक आती-जाती लड़कियों को ताड़ने पर बहस होती, उनका इतिहास-भूगोल क्या रसायन शास्त्र भी जान लेते थे । उनमें से बहुत सी हमें नहीं पहचानती पर हमारे रिश्ते में बेहद करीब होती । अपने खास दोस्त को पहले से शिनाख्त करवा देते - बेटा वो तेरी भाभी है, गर्दन नीची रख 😊!
छोटे शहर में हर बुजुर्ग चाचा होते हैं तो चौक पे उदय चाचा की मिठाई की दुकान पर खास कर मिट्टी के भांड में बनाई हुई चाय के जायके का अलग मजा था, ये बात भी याद दीगर है कि उन्हें 5 में से 4 बार चाय का पैसा ही नहीं देता, बस खिलखिलाते हुए चच्चा प्रणाम कह देता ☺ कभी पैसे दिए भी तो वो इस तरीके से मुंह बनाते जैसे उनके हाथ में लिए पैसे का खबर चेहरे को भी नहीं है ।
कॉलेज से लौटने के क्रम में स्टेशन के साथ एक पहलवान भैया की चाय दुकान थी , वो उनदिनों लोहे के छड़ के एक सिरे को जमीन और दूसरे सिरे को अपने गर्दन में फंसा कर टेढ़ा कर देते और तो और दांत से ट्रक खींचने का माद्दा रखते थे। सच्ची है ये, शायद लिम्का बुक में भी दर्ज है उनसे भी कभी कभी फ्री की चाय मारते, बस् उनके बॉडी और बाइसेप्स के बारे में बड़ाई करनी पड़ती थी । महफूज की ड्रिंकिंग टी वाले बाहियात नोट्स पढ़ कर उस पहलवान भैया की याद आती है 😊
याद ये भी आ रहा, जाड़े के दिनों में चाय में अगर कॉफी छिड़क दो, तो चोफ़ी हो जाती थी 🙂 फिर अलग मज़ा व सुरूर!! वैसे ही इंसान में थोड़ी मेरी सी बेवकूफी हो तो वो भी सरल सहज सा लगने लगता है न ! वैसे इस चॉफी का टेस्ट अभी भी हम ट्राय करते रहते हैं। 😊
मुझे पटना के बाद ट्रेन पे मिलने वाली वो खास चाय , जिसको खराब से खराब चाय के नाम पर बेचा जाता या फिर रामकली चाय 👌 के नाम से बेचा जाता, खूब सारी इलाइची डली हुई वो दोनों चाय पहले घूंट में अच्छी लगती पर उतनी भी शानदार नहीं हुआ करती थी लेकिन हर बार ट्रेन यात्राओं में ढूंढ कर पीता हूँ 😊
दिल्ली में कॉफी बोर्ड या टी बोर्ड की चाय बेहद घटिया लगती है, चाय दूध चीनी आदि मिलाते मिलाते वो चाय रहती है नहीं है, बकरी का दूध लगने लगता है। पर दोस्तों के साथ उसका भी खास मजा है । कभी बेस्ट सेलर प्रकाशक शैलेश भारतवासी की बनाई निम्बू वाली चाय भी शानदार होती है, उनके घर जाने पर स्पेशल आर्डर कर के मंगवाते थे 😊
एक सच्ची बात ये है कि मैंने कैफे कॉफी डे में पहली बार कॉफी तब पी थी जब चौराहे वाली सीढियां फेम किशोर जी से मिलने गए थे। 'चौराहे पर सीढ़ियां' प्रकाशित होने वाली थी, मेरी नजर में वो चेतन भगत टाइप हुआ करते थे और उसके पहले तक मेरा ज्ञान कहता था कि चाय/कॉफी का अधिकतम मूल्य 20-25 रुपये ही हो सकता है। पर उस दिन जब मैनर्स दिखाते हुए मैं पे करता हूँ कहा और बिल काउंटर पर 5 कॉफी का जो बिल बताया गया, मेरे पसीने आ गए थे, क्योंकि किसी वजह से सिर्फ 500 रुपये ही थे और पूरा याद नहीं पर सारे पैसे खत्म हो गए थे 😊 वैसे डिप वाली चाय भी बेहद घटिया होती है ।
अंतिम में एक बात और, मैं अदरक वाली चाय या कॉफी अच्छी बनाता हूँ, और ये बात मेरी सबसे बड़ी आलोचक मेरी बीबी भी कहती है, इसकी मुख्य वजह शायद ये है कि बनी बनाई चाय इनदिनों मैडम को मिलने लगी है । और तो और जब सुबह ये ऑर्डर करते हुए कहती है, आज आपने चाय अभी तक नहीं बनाई, तो फिर मन करता है पानीपत की पांचवी लड़ाई किसी दिन लोधी कॉलोनी में होगी 😊
हाँ तो खूबी इतनी भी नहीं कि दिल में घर बना पाएंगे....पर अपने ठेठपन की वजह से भुलाना भी आसान नहीं ...इतना तो कह ही सकता हूँ 😊
तो चाय/कॉफी बनाने के ज्ञान से याद आया
"ज्ञान सबसे बड़ा धन है।"
फिर स्वयं से पूछा - मैं कितना धनवान हूँ ??
अंदर से आवाज आई - बेटा आप तो बीपीएल कार्ड धारक हो, इस मामले में , ज्यादा पकाओ मत 😊
वैसे आज कोई इंटरनेशनल वाला चाय का दिन है तो इतना ज्ञान पेलना बुरा भी नहीं।
हैप्पी चाय डे 😊 (पुरानी पोस्ट, पुरानी नहीं रहती)
~मुकेश~


Thursday, July 30, 2020

बेस्ट फ्रेंड

Memories ने बताया कि कुछ मेमोरीज ताजिंदगी अंदर सहेजी रहती है या रहनी चाहिए। 💝

तो बस याद आ गई कुछ बदतमीजी, कुछ शौखपना, कुछ खुद को सबके बीच अहम दिखने की कोशिश। तो बस याद आया, कि स्कूल - कालेज के दिनों में, कितने थेथर से होते थे न दोस्त ! साले, चेहरा देख कर व आवाज की लय सुनकर परेशानी भाँप जाते थे । एक पैसे की औकात नहीं होती थी, खुद की, पर फिर भी हर समय साथ खड़े रहते थे, वैसे मेरी औकात तो अधेली की भी नहीं थी। फिर फीलिंग ऐसी आती थी जैसे अंबानी/टाटा हो गया हूँ, पता नहीं किस किस से लड़ लेते थे। साले झूठ मूठ का पिटवा भी देते पर बाद में मलहम भी लगाने आ जाते, ऊपर से कमीने चाय भी पी जाते या फिर टॉफियां। 🎁

गाँव से 2 किलो मीटर दूर हाई स्कूल था, छोटा सा 4 कमरे का। छोटे से स्कूल में  निक्कर पहने, बड़ी बड़ी कारस्तानी करते और वो थेथर दोस्त बड़े प्यार से अपना पीठ आगे कर देते, जब जब लगा कहीं ज्यादा तो न पिट जाऊंगा, तभी कुछ और चौरस पीठ साथ मिले कि तू बेशक कमीना है पर चहेता है..... हाँ तो काहे का फ्रेंडशिप बैंड, पजामे की डोरी से ही काम चल जाता था उन दिनों ☺️

पर उम्र के बढ़ते कदमों के साथ, लाइफ सेटेलमैंट के अलग अलैह जगह के वजह से ऐसी दूरी बन गई कि एक दूसरे के चिंता को भाँप कर भी अनदेखी करना तो दूर की बात है, ये तक नहीं पता कि इन दिनों कौन कहाँ क्या कर रहा, उसे भी कभी फिक्र है भी या नहीं। पर जिंदगी के रोडवेज़ पर ऐसे ही चल रहा सबकुछ, जो सहज सा लगता है अब......... है न यही सच ! 😊

वैसे भी दोस्तों से इतर, जिनको हम दुश्मन जैसा समझते हैं या जिनके लिए मन में जलन रखते हैं, सामान्यतः उनके पीछे भी उनके प्रति बदजुबानी दिखाते हैं। पर कुछ से ट्यूनिंग पहले दिन से ऐसी होती है कि हर वक़्त बेवक्त उनके लिए स्नेह ही झड़ता है। ऐसे कुछ, जिन को हम बेहद अपना सा मानने लगते है, अपने बेहद करीबी परिधि में दिखने वाले ऐसे दोस्तों या ऐसे घरवालों के लिए सामान्यतः सामने से तो झिड़क देते हैं, लड़ लेते हैं या कोई ऊलजलूल सा सम्बोधन दे देते हैं या फिर अपने अनुसार ऑर्डर देने वाले जुबान में बात करते हैं पर अपने सभी कठिनाइयों के लिए भी पहले उन्हें ही ढूंढते हैं।  💐

स्नेह जताने का ये अजब गजब तरीका सबसे अधिक मेरे में है। ऐसा ही घर वालों के साथ भी कर बैठते हैं। शायद कहीं इसको हक़ ज़माना भी कह सकते हैं | ऐसे दोस्त जैसे लोग कहीं भी हो सकते हैं, ऑफिस में, फेसबुक पर या घर वाले तो होते ही हैं | 😊

हक जताने से याद आया, हमें खुद में बॉक्सर सी फीलिंग भी बहुत आती है और अपने बेहद करीबी यानी बेहद अपने से दोस्त पंचिंग बैग सी फीलिंग्स देते हैं । हम बेवकुफ, जब चाहे दे दमादम 😊, अपना सुनाने लगते हैं। शायद कहीं मेरे अंदर का शख्सियत धीरे धीरे उनपर अपना मालिकाना हक सा जताने लगता है। सही-गलत से इतर बात तब बस ये होती है कि उसको मेरी बात मान लेनी चाहिए | पर मानता कोई नहीं, ये भी पूर्णतया सच। 

बहुतों बार, पंचिंग बैग भी रिटर्न किक बॉक्सर के चेहरे पर मार देता है। और चोट के परिमाण से इतर वो एकाएक लगने वाला किक बेहद घातक होता है। अंदर तक हिला देता है। 😢

खैर, ऐवें हैप्पी फ्रेंडशिप डे कह कर खुद को खुश कर लेते हैं, कोई कैसा भी हो जाये, खुद को ख़ुश करने के लिए इतना तो सोच रखेंगे ही कि 😊

मुझमे बेस्ट फ्रेंड मटेरियल भाव की अधिकता है! 💐

है न 😊😊😊

~मुकेश~ 💝


Wednesday, July 15, 2020

ऋषभ : मेरा बेटा



मुझे स्वयं से अत्यधिक नाराजगी की एक वजह ये दिखती है कि यश-ऋषभ पर उनके बचपन में मैंने उनपर हाथ चलाये। शायद इसका कारण मेरे अंदर तथाकथित गुस्से वाले पापा का बैठा होना था, साथ ही अत्यधिक उम्मीदों की गठरी भी, इनके सर पर रखना भी था । पर समय के बदलते रुख के साथ व फेसबुक पर ही अन्य पैरेंटिंग टिप्स ने मुझमे इस नजरिए से, अत्यधिक बदलाव आया। कुछ बरसों बाद से ही, कभी कान मरोड़ना भी हो तो ये काम अंजू का होता है । बदलते समय और अनेकों उदाहरण ने ये भी विश्वास दिलाया कि बच्चे जो मन से करेंगे वो ही बेहतरीन होगा और अब के बच्चे अपने भविष्य के लिए ज्यादा सजग हैं। बस इस विश्वास को दोनों ने बनाये रखने की कोशिश की, इतना देखना ही सबसे सुखद होता है। हर बच्चे का टैलेंट एकदम जुदा है, यश को कम नम्बर आते हैं पर उसको शानदार खेलते देख कर किसी मित्र ने कहा जो शानदार स्पोर्ट्समैन है, वो कमजोर या लल्लू हो ही नहीं सकता। बस मेरे नजरिये में वो बेस्टेस्ट हो गया।

ऋषभ एक दम अलहदा है, जो करेगा पागलपन के हद तक करेगा। एक बार यश को शानदार टीटी के लिए स्कूल में शाबाशी मिलते देख इसको धुन चढ़ गया कि शायद पढ़ाई से बेहतर टीटी है, और बस क्लासेज बंक कर उसके समय टीटी टेबल पर लगने लगे। फिर स्कूल के नंबर 1 और 2 यश-ऋषभ हो गए।

मैंने इन्हें स्कूल के अलावा कभी ट्यूशन का ऑप्शन ही नहीं दिया। और इसके वजह के रूप में इनको अपनी पे-स्लीप दिखाता रहा और बजट बताता रहा। मैंने अपने जिंदगी से जाना है कि कमियां जरूरी ही होती है, क्योंकि चैन लेने नहीं देती। हां पिछले कई वर्षों से मेरिटनेशन के ऑनलाइन क्लासेज के लिए रजिस्ट्रेशन जरूर करवा देता था ताकि कुछ जरूरी सब्जेक्टिव if-buts क्लीयर होते रहे। एक और वजह ये थी कि दोनो एक ही क्लास में टेंथ तक थे, तो एक के ही रजिस्ट्रेशन से दोनो का काम हो जाता था। दोनो ने टेंथ का हर्डल पार किया।

बेहद अच्छे नम्बरों से ऋषभ ने ग्यारहवीं में कदम रखा था। पर मेरे दिमाग में ये समझ नहीं आई थी कि JEE इंजीनियरिंग के लिए किसी अच्छे इंस्टीटूट में दाखिला जरूरी है। वो तो साल बीत जाने पर भाग्य चमका जो जनवरी 2019 में स्कूल के फिजिक्स टीचर ने नारायणा इंस्टिट्यूट के टीचर को मेरे घर भेजा और एक वर्ष के फीस में 60% की छूट की पेशकश की।

हम सरकारी बाबू की फितरत है कि डिस्काउंट में कुछ मिले तो दिमाग चौंधियाने लगता है। फिर ये नहीं सोचे कि 40% फीस भी कम नहीं है, बल्कि 60% जो राशि नहीं देनी पड़ी उसने आकर्षित कर लिया। पर इस एडमिशन ने भी मुझमे कोई खास उम्मीद नहीं बनाई थी । हां मैडम के दिमाग मे कुछ ज्यादा चलने लगा, इसने अपनी 15 वर्ष पुरानी नौकरी झटके में छोड़ दी, जबकि बजट के अब लड़खड़ाने की बारी थी। लेकिन वो अडिग रही। अब फुल टाइमर गार्जियन घर में होता था, जबकि दोनो ने पूरी जिंदगी क्रेच में गुजारी थी।

समय बढ़ा, और ऋषभ में बदलाव ऐसा था कि स्टूडेंट लाइफ में मुकेश जितने घण्टे पढ़ता था, उसका तीन गुना वो पढ़ने लगा। पूरी-पूरी रात लगातार की पढ़ाई के उसके बदलाव में हम सबकी उम्मीदें कुछ चमकी। पर जो सिलेबस दो साल का था, उसको एक वर्ष में करना, इतना हल्का भी नहीं था। नारायणा के टीचर ने कहा था - सर आपने गलती की जो पहले एडमिशन नहीं दिलवाया,और मुझे तब लगा शायद अपने तरह वाला स्नातक बेटा ही बना पाऊंगा। हर वीक टेस्ट के मार्क्स SMS आते जो 15-20% होते जो धीरे धीरे बढ़कर 40% तक गए। फिर PTM में इंस्टिट्यूट के टीचर ने चुपके से बताया अगर ये 40% 55+ तक जाए तो खुश हो जाना। JEE एंट्रेंस और 12वीं दोनो ही साथ करना, कम तो नहीं ही था।

जनवरी में JEE Mains का पहला एग्जाम हुआ और लड़के ने छक्का तो नहीं मारा पर जो आया वो उसके माथे को चूमने के लिए उपयुक्त था। एक औसत लड़के ने 97 परसेंटाइल लाकर चकित किया और इस तरह JEE एडवांस के परीक्षा में बैठने के लिए अहर्ता प्राप्त कर ली, पर मेरे अंदर का बेवकुफ बाप इसलिए परेशान होगया क्योंकि पता चला 12वीं में जब 75% मार्क्स होंगे तभी JEE क्लीयर होना कहलाता है। धुकधुकी तो जिंदगी भर की बात है । मेंस के बाद वो एडवांस की तैयारी ज्यादा करता और मैं बस उससे डेली पूछता - 12वीं में 75% आ जाएंगे न।

खैर, JEE Mains का दूसरा ऑप्शन और Advance का exam date तो अब ऐसे बढते जा रहा है कि पता ही नहीं चल रहा कि भविष्य में क्या छिपा है।

कल जब 12वीं का रिजल्ट निकालने के क्रम में CBSE की वेबसाइट क्रेश हो रही थी, तो सांसे मेरी थम जा रही थी। अंततः घण्टों भर बाद जब रिजल्ट निकला तो मैंने सबसे पहले जोड़कर देखा कि 75% तो है न।

अत्यधिक समय विज्ञान और गणित में इन्वॉल्व रहने के कारण और 12वीं में 5th सब्जेक्ट अर्थशास्त्र से फिजिकल एडुकेशन करने के वजह से इनमें ही कम आ गए पर विज्ञान जिंदाबाद ने ऐसा नारा लगाया कि स्कूल के पहली पंक्ति का छात्र ही रहा। फिजिक्स केमिस्ट्री टॉपर इन स्कूल।

अभी भी अनेक तरह की दिक्कतें हैं, अब तक पता नहीं कि कब एडवांस का एग्जाम होगा, कौन सा इंजीनियरिंग कॉलेज मिलेगा, कैसे क्या करना है, पर खुशियां इन कठिन वजहों के बीच से मुस्कुरा रही है।

आप सबका स्नेह जरूर मुस्कुराहट से भरे होंठ को लंबी करेगा । .... है न।।

~मुकेश~
(तस्वीर 12वीं के अंतिम परीक्षा के बाद वाले दिन की है, जब वो अकेले पहली बार अपने दोस्त के साथ घूमने गया)


Monday, May 18, 2020

मदर्स डे पर पिता को बधाई !

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एक हम सबकी यानी हमारे एजग्रुप या उससे कुछ पहले की जस्ट कॉलेज वाली जिंदगी हुआ करती थी, उस समय ग्यारहवीं यानी आईएससी भी कॉलेज था। तब पापा मने डांट या पिटाई ही कहलाया करता था। पापा तो रावण होते थे ☺️ (उस समय के सोच के हिसाब से)! बैठे बैठे चिल्लाते थे, या फिर घर में घुसते ही मुक्कू......., तनियो चैन नहीं था। हां, मम्मी ही थोड़ा बहुत दोस्त जैसन लगती थी, या मीडियेटर थी, कोई भी जरूरत को पूरा करवाने का ठेका मम्मी पर ही लाद दिया करते थे उन दिनों 😊

फिर समय बिता, कहाँ से कहाँ आ गए, आजकल के शहरी दुनिया में, अधिकतर के तरह सिंगल फेमिली होने लगी। ऐसे में पापाओ को भी लगा थोड़ा बहुत मम्मी वाला काम कर दो तो शायद प्यार ज्यादा मिलेगा साथ ही देखेगा भी कौन ☺️ । ऐसे में मायें भी चालाकी करने लग गईं, चुपके से मम्मियों ने अपने अंदर के 50-60 प्रतिशत अम्मा को पप्पा में ट्रांसफर कर दिया । 😊

शुरुआत तो ऐसे हुआ, मम्मियां उठते ही पापा को ताना देने लगीं, कि देखिए जी बच्चे उठ नहीं रहे, आपसे ही उठेंगे, कान पकड़ कर उठाइये, स्कूल में लेट होगा। और फिर इस तरह धीरे धीरे ड्यूटी ट्रांसफर हो गया, अब सुबह-सुबह बच्चो को पापा को ही उठाना होता है, पापा ही ब्रश करवाएंगे, चड्डी पहनाएंगे, पापा ही दूध बना के पिलायेंगे, पापा ही परांठे का कौर मुंह में ठुंसेंगे। स्कूल का शर्ट जल्दी जल्दी पापा ही भोरे भोरे प्रेस करेंगे । मने सुबह स्कूल जाने तक मम्मी बस नाश्ता बना देगी बाकी आप ही करो, ये मुझसे सुनते नहीं, बस तक लेकर भी पापा ही जायेंगे । ☺️

समय बिता, ऑफिस जाने से पहले पीटीएम में चले जाना, आपका लाडला है आप ही डांट सुनो। ऐसे में पापा जो अपने पापा को याद कर पापा बन बनकर थक चुके होते हैं । उन्हें फ़ॉर चेंज मम्मी की duty ज़्यादा प्यारी लगने लगती है । फिर तो ऐसा समय बदला कि बदल ही गया, अब उल्टा होता है, पापा बच्चे को कहते हैं जल्दी खा लो, जल्दी पढ़ लो , मम्मी गुस्सायेगी। और ऐसे में अब ज़्यादा दुलार को बैलेंस करने के चक्कर में मम्मी विलेन सी बन गयी बच्चों के नज़र में । मम्मी की बल्ले बल्ले हो चुकी है 😊, क्योंकि वो ऐसा कुछ ही तो चाहती थी।

पापा बच्चों के साथ टीवी देखेंगे, मम्मी आकर चिल्लाएगी - खुद तो बिगड़ैल हैं ही मेरे बच्चों को भी बिगाड़ दिया और बस टीवी बन्द! स्कूल जाते समय बच्चों को पैसे दो तो उसमें अब मम्मी कटिंग करेगी, इतना क्यों, जोड़ कर बताओ, ये तुमरे अब्बा तो तुमलोगों को सर चढ़ाए हैं। बेचारे पापा की सिट्टी पिट्टी गुम। 😊

बेचारे डैडी, जो प्यार दिखाने के चक्कर में कुछ ड्यूटी शेयर भर की थी, अब भुगतने लगते हैं 😊

तो आज पप्पा के अंदर वाले 50-60 प्रतिशत अम्मा को भी मदर्स डे की शुभकामनाएं ☺️ साथ ही, नए पापाओ को समझाइश है कि मम्मी के चंगुल में न फंसे ☺️☺️

~मुकेश~


बोधि प्रकाशन के लाइव पर 7 हजार व्युज :) 


Friday, March 27, 2020

जिंदगी, कोरोना के भय में

जिंदगी कितनी कमीनी है, कितनी डरी हुई है और कितना परेशान करती है। देर रात, गले में पता नहीं क्या अटका, एक हल्का सा दर्द पूरे शरीर को सिहराने के लिए काफी था। फिर तो सारा दिमाग अगले क्षण से लेकर अगले बरसो तक का खाका खींचते चला गया, जिसमें हम नहीं थे व दुनिया बेनूर हो चुकी थी। ऐसे में बेहतर है बेवजह ही सही प्रेम, रोमांस, बेवजह वाली कविताएँ, लोटपोट, चंपक, चाचा चौधरी में ही मन खपायें। तो बस .....

देर अंधेरी रात, जब हवाएं भी बह-बहा कर ठंडी होने लगी थी, प्रेम और जिंदगी के मिक्स वेज जैसे सपनों के साथ एक गहरी नींद ले चुका था, कि सपने में ही किसी रोमांटिसिज्म से भरी कविता को सुनते हुए ऐसे लगा जैसे किसी ने कहा - सुनो! और बस अंधेरे में टुकुर टुकुर ताकने लगे 😊 । अब आँखों ने भी हड़ताल घोषित करते हुए कहा - नहीं सोना तो नहीं सोना, जो करना है कर लो। 😊

सपनो में खुश रहना हो तो मुझ से मिलें ;)
वर्ना सफलता के मन्त्र वाचने वाले अनगिनत मिलेंगे :P

नींद कोसो दूर जाकर ठिठकते हुए बाय कर रही थी, हल्की-हल्की ठंड, कहीं दूर से कुत्ते के कुंकने की आवाज़, पुलिस के सायरन और फिर एक-दो कार की बेवजह की आवाजें,  इत्ती रात को भी कहाँ चैन मिलता है किसी को | 😊

साला इन सबके बीच सोच की बत्ती भी भक्क से बुझ जाती है और फिर अंदर-बाहर हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा ! लग रहा था जैसे ब्लैक होल की यात्रा पर कोई अन्तरिक्ष यात्री आया हो । मन कहता है - क्या करें क्या न करें कि ऐसी मुश्किल हाय, कोई तो बताये इसका हल हो मेरे भाय 😊

ऐसे में, अपने घर में ही चोरों की तरह उठो, किचेन का दरवाजा हौले से खोल कर काफी मग मे भर कर काली चाय बनाई जाय (आखिर कौन दूध ढूँढे), गैस लायटर की पिट की आवाज भी ऐसे लगी जैसे अंजू को बता रही हो, देखो भाभी साहब चुपके से चाय बना रहे :) ।  दरवाजे की खटक ऐसी लगी जैसे सच्ची में वो ही निहारी, चिंहुकते हुए फिर धीरे से बालकनी में आकार चाय के सिप के साथ दूर दिख रही सप्त ऋषि तारे के समूह को निहारा रहा था तो.....? पर बालकनी पहुंचने के समय फिर से दिमाग ने कोरोना की ओर गुलाटी मारी और चुपचाप लौट आये 😊

चाय सुड़कते हुए फिर स्कूल/कॉलेज के सात लम्पट और प्यारे दोस्त याद आ गए!! साले कितने कमीने थे, और मैं ........... महा................ :D :) :P मर खप गए होंगे साले :) और क्या, जब याद नहीं करते तो गालियाँ ही देनी होंगी !

गर बचे हुए होंगे, तो पुलिस प्रशासन से निवेदन है कि मेरे ये कमीने दोस्त कहीं दिखें तो 4 की जगह 6 लठ मारना और घर पहुंचा देना ! क्यूंकि जान है तो जहान है व मेरे दोस्त मुझे बहुत प्यारे हैं 🥰 ... है न !!!

हल्की मुस्कुराह्ते सहेजे, छत की ओर गया, तो वहां गमलों के पेड़ों के बीच लगा कोई हाई लेवल मीटिंग चल रही हो, और मैंने वहां पहुँच कर उनके तारतम्य को तोड़ा था ! सुबह कौन सी कली खिलखिलाएगी, कौन सा पत्ता चटख हरे रंग में लहराएगा, हवाओं में कितना स्नेह घोला जाएगा आदि आदि।

महसूस हुआ जैसे करोटन के पौधे ने कहा हो - अच्छा मुक्कू बाबू अकेले अकेले चाय, हमें तो बस सड़ी हुई चाय पत्तियां डाल जाते ही, खूब मजे हैं आपके तो ....... !! अंधेरे में गेंदे/डालियां के मुस्काते फूल भी बस मटकियां मारने लगे। 😊

हमें भी लगा, चलो इसके साथ ही बतियाएं, कुछ मैं कहूँ कुछ वो कहे | कलरफुल करोटन के साथ रंगीन गलाब में रंग बिरंगी फ्रॉक पहने वो ही तो नहीं जो छमक कर बस मेरी खिंचाई में लग गयी हो । होगी जरूर वही होगी, उसका हमें शब्दों से पटकने की अदा भी तो दिल गुलाबी करने वाली ही होती थी।

अंततः पौधों का सान्निध्य ऐसा जैसे लाल दुपट्टा हो मल मल का या हरा आँचल दूर तक फैलाये मुस्कुराहट या फिर साथ में मेरा खडूसपन ............सबके साथ कुछ घंटे बीत चुके थे और चाय भी उदरस्थ हो चुका था, फिर से काली रेटिना पलकों के अंदर से बोली, चलो यार कुछ देर खवाबों की दुनिया में चलें ..........! भोर निकलने ही वाली है :)

किसी ने कहा कुछ लोग सफलता के सपने देखते हैं जबकि अन्य व्यक्ति जागते हैं, कड़ी मेह्नत करते हैं :)

मुझे या तो नींद गहरी आती है तो सपने में अकादमी पुरस्कार ले चुका होता हूँ या फिर नींद नहीं आती तो बस ऐसे ही बात जोहते हुए हुए बतियाता हूँ, कॉफी/चाय के सिप लेता हूँ और तो और चांद सितारे निहारते हुए अपने लिए आसमान का टुकड़ा भी रजिस्ट्री करवा लेता हूँ, ताकि मरने के बाद किसी खास जगह से टिमटिमाते हुए सबपर नजर रखूं 😊

तो बेशक मर जाऊं, मुझे मरने से पहले वाला कुछ घण्टा सबसे अधिक परेशान करता है। इसलिये जीने की ही कोशिश करते हैं। आप लोग भी जीने की जिजीविषा को समेटे रहना। ...है न!! 😊

दुआएँ !💐

~मुकेश!~

Friday, March 6, 2020

लाल फ्रॉक वाली लड़की की समीक्षा - बबली सिन्हा




"लाल फ्राक वाली लड़की" ( पुस्तक)
लेखक- मुकेश कुमार सिन्हा

हां ! यही नाम है प्रेम के हर उस एहसास का जिसे कहीं न कहीं अपने उम्र के दौर में कुछ पल के लिए ही सही पर जीते हम सभी हैं

जी हाँ ! कुछ ऐसी ही है लाल "फ्राक वाली लड़की" नादान मन की भोली ख्वाइश कच्चे पक्के जज्बातों की गठरी जिसकी गिरह पन्ना दर पन्ना जैसे जैसे खुलता है, मन का सुकून एकबार फिर से बीते पलों को जीता चला जाता है

वाकई ! साहित्यिक क्षेत्र में अपने बेहतरीन कविताओं के बल पे एक नई सख्सियत पहचान बनाने वाले मुकेश कुमार सिन्हा जी जिन्हें साहित्य के क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा नया होगा जो इन्हें नहीं जानता होगा, इनकी पहली पुस्तक" हमिंग बर्ड"

मानवीय संवेदनाओं की खुली किताब बनकर हम  पाठकों के सामने आई, जिसे पढ़कर मन ही नहीं बल्कि आत्मा भी भावनाओं से भर उठी,और  जिसे जितनी बार भी पढ़ो हर बार उतनी ही मार्मिकता के एहसास जीवंत कर देती है
इसे पढ़ते हुए पाठक कभी रोता है तो कभी हँस भी पड़ता है, कविता के शब्द-शब्द मानो पाठकों को अंत तक भावनाओं के जरिए अपने में बाँधे रखता है, यही "हमिंग बर्ड" की सफलता का राज है जो हर पाठक की जुवां पे आज भी मचलता है

कुछ ऐसी ही "लाल फ्राक वाली लड़की"

जाड़े की गुनगुनी धूप सी छोटी-छोटी लघु प्रेम कथाओं में वर्णित सुर्ख लाल गुलाबी रंगत लिए प्रेम की सुनहरी चंचल कथाएं❤
सच, इसे पढ़ना शुरू करना अपने हांथ में है पर छोड़ना अपने बस में नहीं ज्यो-ज्यो आप कहानी का आनन्द लेते है त्यों-त्यों और आगे और आगे... पढ़ने की लालसा बढ़ती चली जाती है, पाठकों का यही उतावलावन लेखक को पूर्ण करता है

"लाल फ्राक वाली लड़की" (पुस्तक) इसका तत्कालीन उदारण है, हाल ही में "अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला" में विमोचन के पहले ही दिन इसकी हजारों प्रतियां पाठकों के नाम हुई, एक प्रति मेरी भी और उस पल की प्रत्यक्षदर्शी भी।
जी हां हर उम्र, हर वर्ग के लिए एक साफ-सुथरी बिल्कुल शाकाहारी टाइप पुस्तक जिसे आसानी से हजम किया जा सकता,आप भी पढ़िए यकीन है होठो पे एक खास मुस्कुराहट जरूर बिखर जाएगी....हाँ दोस्तों, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई यही तो तलाशता है एक छोटी सी हंसी
तो बस ! आपकी तलाश पूरी करेगी "लाल फ्राक वाली लड़की"💕

मेरे और मेरे तमाम फेसबुक मित्रों की ओर से एक खास कलाकृति के रचनाकार आदरणीय मुकेश कुमार सिन्हा जी को ढेरों  बधाई शुभकामनाएं💐💐

- बबली सिन्हा

Monday, December 16, 2019

चाय की चाह


चाय के मीठे घूंट की शुरुआत मैया के पल्लू को दांतों में दबाये, उसके होंठों से लगे स्टील के ग्लास को उम्मीदों के साथ ताकने से हुई। फिर ये रूटीन कब फिक्स हो गया याद नहीं कि मैया के चाय के ग्लास के अंतिम कुछ घूंट पर मुक्कू का नाम रहेगा। शायद कभी एक दो बार मैया से गलती हुई और खाली ग्लास जमीन पर रखने पर उसको लगा, उफ्फ्फ ये क्या हुआ, भूल गयी। फिर हमने भी अपने रोने के सुर का वेवलेंथ इतना तेज किया कि उसके कंपन से पूरा घर सहित मैया भी कांप गयी व उन आंसुओं के धार में बहने लगी चाय की जरूरत| फिर तो एक छोटा सा कप या बचपन वाली छोटे स्टील की ग्लास में मेरे नाम का भी चाय बनने लगा, कभी कभी उस चाय के साथ एम्प्रो या मिल्क बिकीज का बिस्किट भी हुआ करता । वो अलग बात है कि इतने शुरुआती दौर से चाय का शौकीन होने के बाबजूद मन यही कहता कि "चाय ऐसी चाहिये जो दूधगर मिठगर होए" यानी अधिक दूध और होंठ चिपकने लायक मीठी चाय ही गांव में रहने के दिनों में पसन्द हुआ करती थी 😊
कॉलेज के दिनों में , सुबह-सुबह घर में बनी चाय के बदले सड़क तक जाकर अपने दोस्त खुर्शीद के छोटी सी दुकान से उसकी बनाई चाय और बिस्किट का मजा लेना भी अजीब नशा था, मुझे अभी भी लगता है उतनी शानदार चाय और कहीं नहीं पी, लगातार उबलते दूध की वो सौंधी महक नहीं भूलने लायक थी । साथ ही, बेवजह की पॉलिटिकल बहस भी यादगार हुआ करती थी। आजकल बड़ा आदमी हो गया मेरा ये चाय वाला दोस्त 😊
उन्हीं दिनों कॉलेज के सामने की झोपड़ी में मौसी की बनाई उफ्फ्फ वो, सबसे घटिया चाय 😊 जो खूब सारी चीनी, और धुएं के वजह से बनती थी और समोसा भी दिल के बेहद करीब था क्योंकि कोयले के धुँए में उबली चाय जैसा कुछ, को हम क्यों पीते थे पता नहीं, पर उस चाय के सहारे दूर तलक आती-जाती लड़कियों को ताड़ने पर बहस होती, उनका इतिहास-भूगोल क्या रसायन शास्त्र भी जान लेते थे । उनमें से बहुत सी हमें नहीं पहचानती पर हमारे रिश्ते में बेहद करीब होती । अपने खास दोस्त को पहले से शिनाख्त करवा देते - बेटा वो तेरी भाभी है, गर्दन नीची रख 😊!
छोटे शहर में हर बुजुर्ग चाचा होते हैं तो चौक पे उदय चाचा की मिठाई की दुकान पर खास कर मिट्टी के भांड में बनाई हुई चाय के जायके का अलग मजा था, ये बात भी याद दीगर है कि उन्हें 5 में से 4 बार चाय का पैसा ही नहीं देता, बस खिलखिलाते हुए चच्चा प्रणाम कह देता  कभी पैसे दिए भी तो वो इस तरीके से मुंह बनाते जैसे उनके हाथ में लिए पैसे का खबर चेहरे को भी नहीं है ।
कॉलेज से लौटने के क्रम में स्टेशन के साथ एक पहलवान भैया की चाय दुकान थी , वो उनदिनों लोहे के छड़ के एक सिरे को जमीन और दूसरे सिरे को अपने गर्दन में फंसा कर टेढ़ा कर देते और तो और दांत से ट्रक खींचने का माद्दा रखते थे। सच्ची है ये, शायद लिम्का बुक में भी दर्ज है उनसे भी कभी कभी फ्री की चाय मारते, बस् उनके बॉडी और बाइसेप्स के बारे में बड़ाई करनी पड़ती थी । महफूज की ड्रिंकिंग टी वाले बाहियात नोट्स पढ़ कर उस पहलवान भैया की याद आती है 😊
याद ये भी आ रहा, जाड़े के दिनों में चाय में अगर कॉफी छिड़क दो, तो चोफ़ी हो जाती थी  फिर अलग मज़ा व सुरूर!! वैसे ही इंसान में थोड़ी मेरी सी बेवकूफी हो तो वो भी सरल सहज सा लगने लगता है न ! वैसे इस चॉफी का टेस्ट अभी भी हम ट्राय करते रहते हैं। 😊
मुझे पटना के बाद ट्रेन पे मिलने वाली वो खास चाय , जिसको खराब से खराब चाय के नाम पर बेचा जाता या फिर रामकली चाय 👌 के नाम से बेचा जाता, खूब सारी इलाइची डली हुई वो दोनों चाय पहले घूंट में अच्छी लगती पर उतनी भी शानदार नहीं हुआ करती थी लेकिन हर बार ट्रेन यात्राओं में ढूंढ कर पीता हूँ 😊
दिल्ली में कॉफी बोर्ड या टी बोर्ड की चाय बेहद घटिया लगती है, चाय दूध चीनी आदि मिलाते मिलाते वो चाय रहती है नहीं है, बकरी का दूध लगने लगता है। पर दोस्तों के साथ उसका भी खास मजा है । कभी बेस्ट सेलर प्रकाशक शैलेश भारतवासी की बनाई निम्बू वाली चाय भी शानदार होती है, उनके घर जाने पर स्पेशल आर्डर कर के मंगवाते थे 😊
एक सच्ची बात ये है कि मैंने कैफे कॉफी डे में पहली बार कॉफी तब पी थी जब चौराहे वाली सीढियां फेम किशोर जी से मिलने गए थे। 'चौराहे पर सीढ़ियां' प्रकाशित होने वाली थी, मेरी नजर में वो चेतन भगत टाइप हुआ करते थे और उसके पहले तक मेरा ज्ञान कहता था कि चाय/कॉफी का अधिकतम मूल्य 20-25 रुपये ही हो सकता है। पर उस दिन जब मैनर्स दिखाते हुए मैं पे करता हूँ कहा और बिल काउंटर पर 5 कॉफी का जो बिल बताया गया, मेरे पसीने आ गए थे, क्योंकि किसी वजह से सिर्फ 500 रुपये ही थे और पूरा याद नहीं पर सारे पैसे खत्म हो गए थे 😊 वैसे डिप वाली चाय भी बेहद घटिया होती है ।
अंतिम में एक बात और, मैं अदरक वाली चाय या कॉफी अच्छी बनाता हूँ, और ये बात मेरी सबसे बड़ी आलोचक मेरी बीबी भी कहती है, इसकी मुख्य वजह शायद ये है कि बनी बनाई चाय इनदिनों मैडम को मिलने लगी है । और तो और जब सुबह ये ऑर्डर करते हुए कहती है, आज आपने चाय अभी तक नहीं बनाई, तो फिर मन करता है पानीपत की पांचवी लड़ाई किसी दिन लोधी कॉलोनी में होगी 😊
हाँ तो खूबी इतनी भी नहीं कि दिल में घर बना पाएंगे....पर अपने ठेठपन की वजह से भुलाना भी आसान नहीं ...इतना तो कह ही सकता हूँ 😊
तो चाय/कॉफी बनाने के ज्ञान से याद आया
"ज्ञान सबसे बड़ा धन है।"
फिर स्वयं से पूछा - मैं कितना धनवान हूँ ??
अंदर से आवाज आई - बेटा आप तो बीपीएल कार्ड धारक हो, इस मामले में , ज्यादा पकाओ मत 😊
वैसे आज कोई इंटरनेशनल वाला चाय का दिन है तो इतना ज्ञान पेलना बुरा भी नहीं।
हैप्पी चाय डे 😊
~मुकेश~