कविता संग्रह "हमिंग बर्ड"

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Thursday, February 3, 2022

फ्रेंड - अनफ्रेंड

 बिना किसी वजह के अनफ्रेंड होना, एकदम से अवसाद ग्रसित करता है न।

😊 साथ ही साथ सामान्य रूप से सिर्फ जगह बनाने भर के लिए अनफ्रेंड करना भी अजीब सी अनुभूति देता है, जैसे सच्ची में सबसे छोटी उंगली मिलाकर कह रहे हों, जा तुझसे मित्रता टूटी । ☺️
बेशक शून्य सँवाद रहा हो पर अमित्र करने की पहल करने से बचता हूँ, पर शुरुआती दौर में धड़ाधड़ मित्रसूची का पहाड़ तैयार कर लिया, जिनमें बहुत से मित्रों की ओर से कोई सँवाद नहीं है, और मेरे ओर से भी न तो हर एक के वाल पर पहुंचना सम्भव है और न ही उनके कोई नोटिफिकेशन्स आते हैं। 😊 और तो और, मुझे लगता है दस प्रतिशत से ज्यादा मित्र ऐसे होंगे जिन्होंने वर्षों से फेसबुक चलाया ही नहीं। और हाँ, ये कोरोना काल बहुत से बेहतरीन लोगों को स्वर्गीय भी बना गया, लेकिन उनकी प्रोफ़ाइल सूची में दर्ज है। ऐसे में अब जबकि अधिकतम मित्र सूची की संख्या को छू चुके हैं, और फिर भी करीबन हजार रिक्वेस्ट पेंडिंग हैं, साथ ही कभी न कभी तो लगता हैं किसी को रिक्वेस्ट भेजें, पर करें तो क्या करें। 😊
वैसे तो है मेरा पेज भी, जहां पर लाइक्स यानी फॉलोअर्स भी ठीक ठाक हैं पर दोस्ती तो प्रोफ़ाइल पर ही जँचती है, है न। 😊
ये भी सच है कि बहुत से वरिष्ठ या गरिष्ठ एकतरफा मित्रता मने फैन फॉलोइंग टाइप ही चाहते हैं। 😊 वो खूब एक्टिव रहकर भी कभी न कहेंगे - मुक्कू बढ़िया लिखे हो, उन्हें तो लगता है जैसे एक पाठक सूची जोड़ी है 😊। पर इनमें से भी किसी एक को हटाने पर, उन्हें तुरंत पता चल जाता है, फिर मैसेज जरूर आता है, तंज वाला कि अनफ्रेंड कर दिए?? फिर से उन्हें जोड़ा, लेकिन ज्यादा दर्द तब लगता है कि उसके बावजूद उन्हें कोई पोस्ट/तस्वीर अलाना-फलाना उपस्थिति लायक न दिखी । 😊
खैर, फेसबुक के चोंचले हैं, जो साथ ही रहेंगे, मित्र तो जान हैं, वो सूची में रहें या न रहें 😊
(एनीवे, मोबाइल पर टाइपिंग स्पीड इस तरह भी कुछ न कुछ लिखते हुए देखना चैये 😊 )
.... है न !

( मेरी संग्रह बस आने वाली ही है, उम्मीद रहेगी आपके हाथों तक पहुँचने की )


Monday, August 19, 2019

थेथर से होते थे न दोस्त



स्कूल - कालेज के दिनों में, कितने थेथर से होते थे न दोस्त ! साले, चेहरा देख कर व आवाज की लय सुनकर परेशानी भाँप जाते थे । एक पैसे की औकात नहीं होती थी, खुद की, पर फिर भी हर समय साथ खड़े रहते थे । और फिर फीलिंग ऐसी आती थी जैसे अंबानी/टाटा हो गया हूँ, पता नहीं किस किस से लड़ लेते थे। साले झूठ मूठ का पिटवा भी देते पर बाद में मलहम भी लगाने आ जाते, ऊपर से कमीने चाय भी पी जाते।
गाँव से 2 किलो मीटर दूर हाई स्कूल था, छोटा सा 4 कमरे का। छोटे से स्कूल में निक्कर पहने, बड़ी बड़ी कारस्तानी करते और वो थेथर दोस्त बड़े प्यार से अपना पीठ आगे कर देते......... काहे का फ्रेंडशिप बैंड, पजामे की डोरी से ही काम चल जाता था उन दिनों ☺️
पर उम्र के बढ़ते कदमों के साथ, ऐसी दूरी बन गई कि एक दूसरे के चिंता को भाँप कर भी अनदेखी करना तो दूर की बात है, ये तक नहीं पता कि इन दिनों कौन कहाँ क्या कर रहा, उसे भी कभी फिक्र है भी या नहीं। पर जिंदगी के रोडवेज़ पर ऐसे ही चल रहा सबकुछ, जो सहज सा लगता है अब......... है न यही सच !
वैसे भी दोस्तों से इतर, जिनको हम दुश्मन जैसा समझते हैं या जिनके लिए मन में जलन रखते हैं, सामान्यतः उनके पीछे भी उनके प्रति बदजुबानी दिखाते हैं।
पर कुछ से ट्यूनिंग पहले दिन से ऐसी होती है कि हर वक़्त बेवक्त उनके लिए स्नेह ही झड़ता है। ऐसे कुछ, जिन को हम बेहद अपना सा मानने लगते है, अपने बेहद करीबी परिधि में दिखने वाले ऐसे दोस्तों या ऐसे घरवालों के लिए सामान्यतः सामने से तो झिड़क देते हैं, लड़ लेते हैं या कोई ऊलजलूल सा सम्बोधन दे देते हैं या फिर अपने अनुसार ऑर्डर देने वाले जुबान में बात करते हैं पर अपने सभी कठिनाइयों के लिए भी पहले उन्हें ही ढूंढते हैं।
स्नेह जताने का ये अजब गजब तरीका सबसे अधिक मेरे में है। ऐसा ही घर वालों के साथ भी कर बैठते हैं। शायद कहीं इसको हक़ ज़माना भी कह सकते हैं | ऐसे दोस्त जैसे लोग कहीं भी हो सकते हैं, ऑफिस में, फेसबुक पर या घर वाले तो होते ही हैं |
हक जताने से याद आया, हमें खुद में बॉक्सर सी फीलिंग भी बहुत आती है और अपने बेहद करीबी यानी बेहद अपने से दोस्त पंचिंग बैग सी फीलिंग्स देते हैं । हम बेवकुफ, जब चाहे दे दमादम 😊, अपना सुनाने लगते हैं। शायद कहीं मेरे अंदर का शख्सियत धीरे धीरे उनपर अपना मालिकाना हक सा जताने लगता है। सही-गलत से इतर बात तब बस ये होती है कि उसको मेरी बात मान लेनी चाहिए | पर मानता कोई नहीं, ये भी पूर्णतया सच।
बहुतों बार, पंचिंग बैग भी रिटर्न किक बॉक्सर के चेहरे पर मार देता है। और चोट के परिमाण से इतर वो एकाएक लगने वाला किक बेहद घातक होता है। अंदर तक हिला देता है।
खैर, ऐवें हैप्पी फ्रेंडशिप डे कह कर खुद को खुश कर लेते हैं, कोई कैसा भी हो जाये, खुद को ख़ुश करने के लिए इतना तो सोच रखेंगे ही कि
मुझमे बेस्ट फ्रेंड मटेरियल भाव की अधिकता है
है न 😊😊😊
~मुकेश~ 💝