कितना अच्छा और मजेदार होता न, जो मानवीय भावनाओं को स्थूल रूप दिया जा सकता | पागलपन की गोलियां बनाई जाती - जो खोले, वही साहित्यकार | प्रेम की रंग बिरंगी टिकिया होती , जिसे दे दो वही रात के तारे गिने | कविता का भी पाउडर बाजार में बिका करता| तब तो हम हर मित्र को यही उपहार में भेजते | कविता की पुडिया पानी के साथ खाओ और फिर छंद लिखो, ज्यादा खा लिया तो धनाक्षरी, माहिया सोहर संगीत सब लिख डालो...............
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सोचो सोचो, कोई ऐसी ईजाद क्यों नहीं !! आखिर ऐसी उल जलूल सोच ही तो खुशी देती है
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सोचो सोचो, कोई ऐसी ईजाद क्यों नहीं !! आखिर ऐसी उल जलूल सोच ही तो खुशी देती है
सही है... कभी कभी ऐसा भी सोचना चाहिए...उम्दा...बहुत बहुत बधाई...
ReplyDeleteनयी पोस्ट@भूली हुई यादों