कविता संग्रह "हमिंग बर्ड"

Friday, December 30, 2016

यादें - 2016

वर्ष बीतने को है, क्या खोया क्या पाया में खोने की बात क्यों ही करें, पाया ही पाया है, स्नेह जो है, वो रहे, इत्ती सी उम्मीदों के साथ :)
अगर उपलब्धियां गिनाने के लिए वर्ष की शुरुआत पिछले दिसंबर से कर लूं, तो भी क्या फर्क पड जाएगा, खुद को खुश करने का बहाना तो चाहिए ही चाहिए :)
# दिसंबर'15 के पहले सप्ताह में दिल्ली फिल्म फेस्टिवल (DIFF) द्वारा poet of the year का अवार्ड प्राप्त करना, और ऋतुपर्णा सेन गुप्ता के साथ अवार्डी के लाइन अप में मंच शेयर करना, खुद को बेहद बेहद खुश करने वाली उपलब्धि रही !! # इसके बाद करनाल में 'प्रतिमा रक्षा सम्मान समिति' द्वारा और इलाहाबाद में "करुणावती साहित्य धारा" साहित्यिक पत्रिका द्वारा प्राप्त सम्मान सहेजने लायक था | # स्वयं पर न तो भरोसा रहा, न ही जताया इसलिए 11 मार्च को YMCA University of Science & Technology के वार्षिक फेस्ट में काव्योत्सव में जूरी बनने का मौका मिलना, यादगार पल थे | # 17 सितम्बर को गूँज के तत्वाधान में 100 रचनाकारों को लेकर प्रकाशित साझा संग्रह "100कदम" का विमोचन हुआ, मेरे द्वारा सह-सम्पादित ये छठी कृति थी, याद रखना तो बनता है :) | # हम सबकी एक छोटी सी संस्था, गूँज ने विश्व पुस्तक मेले में भी एक कविता गोष्ठी का आयोजन लेखक मंच पर किया ! गूँज व्हाट्स एप ग्रुप, फेसबुक पेज, ट्विटर हैंडल, और फेसबुक ग्रुप के माध्यम से आप सबके बीच है, साथ ही कोशिश रहती है, कि हम सबकी भी छोटीमोटी पहचान बने | # प्रकाशन की बात करें, तो लखनऊ से प्रकाशित कथाक्रम, फिर दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण और हिन्दुस्तान के पटना संस्करण में कविता का प्रकाशन खुद में छोटे मोटे कॉन्फिडेंस लाने के लिए बढ़िया था !! # साथ ही, 'अभिनव मीमांसा', लोकजंग, शिखर विजय के दीपोत्सव विशेषांक, हस्ताक्षर, नव-अनवरत, INVC में प्रकाशन भी यादगार रहे, और हाँ "लफ्जों में परे" साझा संग्रह में शामिल होना भी ख़ुशी दे गया |
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बस खुशियों के बहानों की यही है मेरी कतरन, मेरे औकात से ज्यादा :) :D :) *अंतिम बात, स्वयं के कविता संग्रह हमिंगबर्ड का नाम भर सुनने से अभी भी सबसे अधिक ख़ुशी होती है :)


Wednesday, November 16, 2016

लघु प्रेम कथा



संसद मार्ग एटीएम के सामने पंक्तिबद्ध लड़का जो करीब 300 लोगो के बाद खड़ा था, और उसके बाद फिर करीबन 200 लोग खड़े थे ! बेसब्री से बैंक के दरवाजे खुलने का सबों को इन्तजार था ! कोई गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी वाले चाय बाँट रहे थे, सभी लाइन में खड़े पकते लोगो के लिए !! :o
तभी उनसे एक चाय का कप लेकर एक लड़की उस लड़के को देते हुए बोली, कितना थक गए हो आप, लो चाय पियो :)
उफ़ इतनी लम्बी लाइन में सिर्फ वो :) , जिसको चाय पेश किया गया, वो भी एक खुबसूरत बाला द्वारा! चाय के पहले घूँट के साथ सारी थकान मिट चुकी थी ! दूसरी घूँट गटकते हुए निहार रहा था ...:)
लड़की ने फिर थोडा जोर से आवाज में दम लगा कर कहा - एक कप और लाऊं क्या ? साथ ही हलके से विस्पर करते हुए आँखों में नरमी लाते हुए बोली,
"प्लीज मेरा भी दो हजार का नोट बदल दोगे?"
चाय की मिठास में कडवी गोली सी लगी सुनते ही, क्योंकि पापा ने कहा था, आज चार हजार बदल कर ही आना, वर्ना मत आना !
पर लड़की के आँखों में अथाह प्रेम का आकाश दिख रहा था, जो हर दर्द को दूर दिखती खुशियों के वादियों तक ले जाना चाह रही थी ........!!
लड़के के कुछ कहने से पहले ही, लड़की ने फिर कहा, रहने दो, मैं एक कप चाय और लाती हूँ, ....मैं तो लाइन में लग जाउंगी !
इस्सस, ये इमोशनल अत्याचार ! पापा के गुस्से वाली नजर और ये प्रेम बरसाती नजर ! किस तरफ जाए !!
चाहते न चाहते, पता भी नहीं चला, वो दो हजार का नोट पकड़ चुका था, और लड़की प्रेम सिक्त आँखों से कृतज्ञ नजरों के साथ निहार रही थी !
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कुछ अदलाबदली पिंक इफेक्ट ला चुका था :D, बेशक पापा से पिटने या डांट खाने का दर्द कैसे भूले, ये सोच रहा था :)
लड़के ने लड़की को पिंकी (वही गुलाबी दो हजारी नोट) दी, बदले में लड़की ने अपना मोबाइल न. और फिर अगले सप्ताह रीगल पर मिलने का वादा :)

प्रेम व ख़ुशी संक्रामक है :)

Friday, November 11, 2016

500 का नोट और प्रेम




सुनो
पिछले बार, याद है न
कैफे कॉफी डे के काउंटर पर
मैंने निकला था 500 का कड़क नोट
लेना था केपेचिनों का दो लार्ज कप

वो बात थी दीगर
कि, पे किया था तुमने
जिससे
थोड़ी असमंजस व संकोच की स्थिति के साथ
फिर से डाल लिया था, पर्स के कोने में
अकेला नोट पांच सौ का !

उस पल लगा था अच्छा,
चलो बच गए पैसे !!
प्यार और प्यार पर खर्च
क्यों होते हैं बातें दीगर

आखिर खाली पॉकेट के साथ भी तो
चाहिए थी
प्यार व साथ

सुनो
पर वही 500 का नोट
सहेजा हुआ है पर्स में
तुम्हारे दिए गुलाब के कुछ पंखुड़ियों के साथ
क्योंकि तुमने काउंटर से जब उठाया था
कि पे मैं करुँगी
तो तुम्हारे हाथों के स्पर्श से सुवासित
वो ख़ास नोट
हो गयी थी अहम्

सुनो
शायद तुम्हारी अहमियत पर भी लग चुका है पहरा
तभी तो
अब तक सहेजा हुआ था वो ख़ास नोट
कल ही बदल कर ले आया
सौ सौ के पांच कड़क नोट

सुनो
चलें चाय के ढाबे पर
दो कटिंग चाय आर्डर करूँगा
उसी सौ के नोट के साथ

कल मिलोगी न !!
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:) :) :)

लालित्य ललित के साथ

Monday, October 17, 2016

सुनहरे पल

सुनहरे पल
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बात 25 दिसंबर 2003 की है, मेरी पोस्टिंग प्रधानमत्री कार्यालय में हुआ करती थी. उस समय के तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन था, छुट्टी का दिन था,  मेरे ऑफिसर ने एक दिन पहले ही कहा था मुकेश तुम्हे आना होगा सारे सीनियर ऑफिसर्स शाम में प्रधानमन्त्री जी को बुके प्रदान करेंगे,  तुम ये सारा अरेंजमेंट देख लेना !!

ज्यादा पुरानी नौकरी थी नहीं, और न ही उस समय फेसबुक जैसी कोई बुरी आदत थी, तो कुछ ज्यादा ही सीरियस हुआ करते थे काम के प्रति :)

मुझे तो ये भी याद है मेरी प्रधानमन्त्री कार्यालय में पोस्टिंग के बाद जो पहली चिट्ठी पापा को लिखी थी उसमे बताया था की पापा यहाँ तो बाथरूम में भींगे हुए हाथो को सुखाने के लिए भी गरम पंखे लगे हैं :D, यानी ऐसे बैकग्राउंड से दिल्ली पहुंचे थे !!

हाँ तो बुके के साथ हम इन्तजार कर रहे थे प्रधानमन्त्री के कमरे के बाहर कोरिडोर में, सारे ऑफिसर्स, जिनमे से तत्कालीन प्रमुख सचिव ब्रजेश मिश्र और सभी आ गए, करीब साढ़े पांच बजे आदरणीय अटल जी ने कमरे में कदम रखा,  करीब चार पांच मिनट बाद संयुक्त सचिव सेकिया सर ने दरवाजे से मुंह निकाल कर हौले से कहा - मुकेश बुके लेकर आओ, !! मुझे लगा बुके उन्हें पकड़ाना है,  वो लोग खुद ही देंगे, ऐसा ही होना  भी  चाहिए  था !!

पर ये क्या,  कमरे में घुसते ही,  सबने अटल जी को घेर रखा था,  सर ने कहा - "दो बुके !!"
आश्चर्यचकित सा, एक क्षण को मेरी टाँगे कांपी, मैंने आगे बढ़ कर,  बुके आदरणीय अटल जी को पकडाया,  उन्होंने बस पकडे रखा,  सबने तालियाँ बजाई,  फिर मैंने ही बुके को साइड के टेबल पर रख दिया !!

उस समय कैमरा या सेल्फी तो होता नहीं था,  जो उस क्षण को तस्वीर में कैद किया जा सके, पर हाँ,  झपकते पलकों के अन्दर कहीं,  सहेज कर रख लिया मैंने !! में तो बस कैरियर ही तो था बुके का,  लेकिन आंतरिक ख़ुशी, बेवजह हो गयी...... !!
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जिंदगी के कुछ ऐसे ही #सुनहरेपलमुकेशके :) :)

16.10.2016 के लोकमत समाचार के राष्ट्रीय संस्करण के रविवारीय परिशिष्ट 'लोकरंग ' में

Friday, September 30, 2016

लघु प्रेम कथा

लघु प्रेम कथा
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कॉलेज के उसी खास दरख़्त के नीचे लीजर पीरियड में समय काटते हुए लड़के ने अपने दिमाग में प्रेम व विज्ञान के घालमेल के साथ बोला - ओये ! अच्छा ये बताओ दो हाइड्रोजन एटम एक ऑक्सीजन के एटम के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया कर H2O यानि जल में परिवर्तित हो जाता है,
तो वैसे ही मान लो कि तुम ऑक्सीजन हो और मैं एक हाइड्रोजन !!
अब बड़ा प्रश्न ये है कि ये साला दूसरा हाइड्रोजन कौन है ??? ;)

बेवकूफ वो देख, कॉलेज गेट पर सायकल टायर पेंचर बनाने वाला गठीला सांवला नौजवान! क्या ख्याल है उसे दूसरा हाइड्रोजन समझने में - लड़की इतराते हुए मुस्कायी ^_^

हुंह !!
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लड़के ने फिर से बकैती की - अगर इन एटम्स ने लिंग परिवर्तन कर लिया !!
ऐसे सोच कि मैं वो एक ऑक्सिजन और तू एक हाइड्रोजन तो दूसरी हाइड्रोजन कौन ? :P

तब बेटा, दुनिया में पानी ही नही होता ! क्योंकि तुममे ऐसा आकर्षण कहाँ की दूसरा हाइड्रोजन रूपी लड़की चिपके ! बड़ा आया कैमिकल रिएक्शन वाला ;)

दोनों कॉलेज कैंटीन चल पड़े पानी से बनी चाय पीने ;)

100 कदम मेरे द्वारा सह सम्पादित, प्रतिभागी रचनाकार रिया हरप्रीत के हाथो में

Monday, September 5, 2016

शिक्षक दिवस




एक राय सर थे, हाई स्कूल के जमाने में ! कितना प्यारा स्कूल था - श्री सीता राम राय उच्च विद्यालय :) अजब घालमेल था उनके सब्जेक्ट में, एक तरफ तो इतिहास पढ़ाते थे, दुसरे तरफ स्पोर्ट्स भी उनके पास था, मने कोई भी एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी हो तो उनके पास होगा !! खासियत ये थी कि किस बच्चे को पीटना है, ये वो पहले से डिसाइड कर के आते थे, कितना भी रट लो, अख़बर-बीरबल-नूरजहाँ-कबीर पूछने का अंदाज ही ऐसा था कि बच्चा सुसु कर दे ! मान लो हमने सही जबाब दिया, तो एक दम कड़क कर काउंटर क्वेश्चन - क्या ये सही है ? ये होगा? और फिर सिटपिटाते ही तरतरतर.....:) या फिर दो ऊँगली के बीच पेंसिल/पेन रख कर कच्च से दबा देते थे, हाय हो :D हाँ तो एक बार जिला स्तरीय क्विज में जाना था उनके साथ, और प्रशासन का आदेश एक लड़का/एक लड़की पेयर में होगा, थी हमरी पेयर भी थोड़ी ज्यादा सी अनगढ़ खुबसूरत, थोड़ी गंवार ! स्कूल भी तो उतना ही ख़ास था, को-एजुकेशन होने के बावजूद लड़के लड़कियों के बीच मैकमोहन लाइन खिंची रहती थी ! जाने से पहले ढेरों लड़कों का वाण चला- साले जीत के तो नहीये आएगा, पर तुमको विन्नर का अवार्ड तो साथ में स्कूले से मिल गया :) वो थी गुडगोबर, और हम भी तीसमार खान तो थे नहीं, पर विसुअल राउंड और टिपिकल प्रश्नों पर बेहद कमांड था ! बेमतलब वाले प्रश्नों का जबाव फट से निकल जाता ! वैसे उसने भी सभी मुग़ल बादशाह और विटामिन सिटामिन रट्टा लगाया था! जैसे तैसे फ़ाइनल राउंड में पहुंचे :) राय सर चिहुँकते हुए आये, मुक्कू, चलो तुम दोनों को समोसा खिलाते हैं :) सर पेट भरल है - वो बेवकूफ स्टाइल मारी हमने चुप्पे से कहा- अरे बेवकूफ, क्यों इन समोसों पर भी अपनी नजर लगा रही हो, सरकारी है............तुम चुपके से हमको दे देना, नहीं खाना है तो !! अंततः विनर तो नहीं हुए, पर गलती सही, सभी ग्रामीण स्कूलों से ही पहुंचे थे, तो बस गलती से ही सही रनर बन कर लौटे वहां से निकलने पर सर ने पांच रुपया ऐसे पकडाया जैसे घर से दे रहे हों ऊपर से आदेश इसको साथ ले जाओ घर तक :) _____________________ हमें तो मजनू, फरहाद, रोमियो जैसी फीलिंग आ गयी, पर बचपन का वो डर - घर पहुंचाने के दरम्यान बस कहे - तुम सुन्दर हो ! बकलोल :D उसने कहा - तुमरे कारण जीते, नहीं तो मुंह में खरोंच मारते, बाघिन जैसन :) राय सर जिंदाबाद का नारा दुसरे दिन स्कूल में लगा था :D और उसके बाद, इतिहास में कभी छड़ी भी नहीं पड़ी :) सर को याद करते हुए सबको शुभकामनायें :) :)

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Thursday, August 4, 2016

लघु प्रेम कथा

लघु प्रेम कथा
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लड़का : कभी-कभी इन मुरझाये पौधों और कम चमकते फूलों को देखकर तुम्हे ये बेशक ख़याल नहीं आता होगा कि इनके लिए भी कभी न कभी तुम्हे मसाले वाले पनीर या बटर चिकन या लस्सी बनाना चाहिए तुम्हे :)

लेकिन, ......तुम्हारे छिपे नजरों से कई बार चिकन के टुकड़े या पनीर को कुतर कर डाल चुका हूँ, .........और तो और कई बार ठंडी चाय भी उढेली है, समझी !!

अरे यार, ये हमारे पालतू या हम-दम से ही तो हैं, समझती हो न !!

लड़की : हे भगवान् !! ये मरदूद हरियाली .......उफ़!! तभी तुम्हे देख कर सलाम ठोंकने वाले अंदाज में बिछ जाते हैं !! हुंह !
कल से पानी भी बंद करती हूँ इनका ............ !!
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ओये बेवकूफ, सुनो न !
तुम भी तो महंगे गिफ्ट के बदले ठेले वाले गोलगप्पों व मीठी लोजेंस के कारण ही अपनी सी हो गयी हो...........भूल गयी क्या :)

अपना बनाना सीखो मैडम !! ^_^

Thursday, May 19, 2016

शशि पुरवार के शब्दों में : हमिंग बर्ड


हमिंग बर्ड मुकेश कुमार सिन्हा का प्रथम संग्रह है , संग्रह का प्रकाशन २०१४ मे हुआ था, समीक्षा हेतु उनकी पांडुलिपी भी आई थी उसके उपरांत २०१५ में संग्रह हाथ में आया, व्यस्तता और अपरिहार्य कारणों से हमिंग बर्ड पर समीक्षा नहीं लिख सके थे. लेकिन कुछ शब्द न लिखे ऐसा नहीं हो सकता था। उनकी कलम को शुरुआती दौर से देखा छटपटाते देखा है। उसी छटपटाहट का रचना संसार है हमिंग बर्ड। मुकेश कुमार सिन्हा की रचनाएँ आम आदमी के आसपास घूमती हैं ,आम बोलचाल की भाषा में रचित रचनाएँ,पाठकों को उनकी पृष्ठभूमि से जोड़ती है. हमिंग बर्ड एक ऐसी चिड़िया है जो हर दिशा में अपनी उड़ान भरती है,उसी के अनुरूप मुकेश कुमार सिन्हा की रचनाएँ किसी एक पृष्ठभूमि या संवेदनाओं से नहीं उपजी है वरन रोजमर्रा की जिंदगी का आइना है। हर वर्ग की मासूमियत,छटपटाहट उनकी रचनाओं का संसार है. कवितायेँ ठेठ हिंदी भाषी न होकर मिश्रित भाषा की अभिव्यक्ति है। यहाँ अंग्रेजी भाषा का समावेश है तो आंचलिक भाषा की खनक भी है। कुल मिलाकर कविताओं में आम बोलचाल की भाषा प्रयुक्त की गयी है जो आम आदमी को उससे जोड़ती है। आम आदमी की तपिश, अंतःस की छटपटाहट जस की तस संग्रह में व्यक्त की गयी है।  
एक रचना है -- -मेरे अंदर का बच्चा /क्यों करता है तंग /अंदर ही अंदर करता हुड़दंग इसी प्रकार कवि का हृदय बच्चे के समान लड़खड़ाते हुए चलता है और कविताओं की सहज अभिव्यक्ति करता है, मध्यम वर्गीय, निम्न वर्गीय, काम की तलाश में घूमता आदमी ,कोने में पड़ा हुआ डस्टबीन, हाथ की लकीरे, पगडण्डी ,मकान, आवाज ,मेट्रो की लाइफ , जिंदगी का गणित, मृत्यु , मनीप्लांट , या सिरमिरिया पूल , उदासी। ...... जैसे अनगिनत विषय वस्तु का कविताओं में समावेश है। ऐसे विषय जिसके बारे में आसानी से कविता गढ़ देना सहज नहीं होता है. सभी परिस्थितियों में रची गयीं कवितायेँ नीरस नहीं है , अपितु सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत व्यवस्था व परिवेश से झूझती नजर आती हैं। 
कविता संवेदना शून्य नहीं होती है संवेदनाओं से जन्मी हुई कवितायेँ अपनी राह ढूंढ ही लेती है। सीखने - पढ़ने - लिखने की ललक कवि हृदय में हिलकोरे मरती है , इस संग्रह में कुछ हाइकु का समावेश है। रचनाओं की अकुलाहट उनके भीतर मौजूद है, कविताओं में शिल्प, लय , छंद को छोड़ दिया जाये तो रचनाएँ पाठक तक अपना कथ्य पहुँचाने में समर्थ है।  
हर परिस्थिति में रचे संवेदना के हर शब्द, विलक्षण है। पाठक इन रचनाओं को पढ़कर गुदगुदाता है। जीवन के हर प्रसंग को कवि ने भावपूर्ण , सरल अभिव्यक्ति द्वारा सहजता से व्यक्त किया है। एक कवि हृदय बच्चे की छटपटाहट है। जो उन्हें साहित्य सफर में आगे तक ले जाएगी। हमिंग बर्ड लोगों के दिलों पर राज कर चुकी है, मुकेश कुमार सिन्हा जी को तहे दिल से शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई , वह इसी तरह सृजन करते रहें और साहित्य के पथ पर नित नए कीर्तिमान स्थापित करें।
उन्ही के शब्दों में -- सुनो, अगर मेरे जाने के बाद कभी भी मेरी आवाज सुनना चाहो मेरी स्मृतियों की खनखनाहट से देना। ....... न आसमान को मुट्ठी में कैद करने की थी ख्वाहिश और न , चाँद तारे तोड़ने की चाहत कोशिश थी तो बस इतना तो पता चले कि क्या है अपने अहसास की ताकत। ...... इतना सा अरमान कि प्यार की ताकत मै ढूँढू अपनी पहचान। .......  
हार्दिक शुभकामनाओं सहित - शशि पुरवार





Tuesday, May 10, 2016

मंगला रस्तोगी के शब्दों में हमिंग बर्ड


हर किसी की अपनी एक अलग दुनिया होती है थोडी हकीकत थोड़ी कल्पनाओं से भरी दुनिया जिसमें बहुत कुछ घटता है..
मुकेश कुमार सिन्हा जी का काव्य संकलन " हमिंग बर्ड" भी कुछ ऐसा ही है! जीवन की हर छोटी बड़ी बात या कहें कि जीवन के हर प्रसंग में कविता रूप में हमिंग बर्ड अविराम उपस्थित है!  मुकेश  जी कीसबसे बड़ी खासियत यह है कि वह कविता को जीते हैं चलते-बैठते जागते सोते.. जिन्दगी की भागमभाग में भी कविता रचने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करते हैं हर उस लम्हें से जिसे वह अपने आस-पास घटता महसूस करते हैं!  मेरा मानना है कि जो जिंदगी को लम्हा लम्हा जीता है वहीं कविताओं को इतनी संवेदनशीलता के साथ रच सकता है जैसी रची गई हैं.. हमिंग बर्ड में.. 

मेरी जिंदगी के
जिन्दा दिली के चौखट पर
जब देता है दस्तक
मेरा 5मिली ग्राम का छुटकू - सा मन
मारता है कुलाँचे
सिमित शब्दों से भरता है रंग
आसमान के कैनवस पर
दिख जाती है फडफडाती हुई हमिंग बर्ड
एवें ही बन जाती है कविता! 

मुकेश जी की कविताओं में स्त्री के विभिन्न रूप हैं, प्रकृति के रंगो के साथ बचपन और आते हुए बुढ़ापे की छटपटाहट भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है.. ☺
चालीस के बाद, पचास के पहले -
जहां शरीर तय कर रहा होता है सफर
निश्चित शिथिलता के साथ
ढुलमुल पगडंडियों पर
उम्र का यह अन्तराल
है एक रेगिस्तानी पड़ाव
जब होता है अनुभव
होता है वो सब जो हासिल करने की
की थी कोशिश हर सम्भव!
महीने की पहली तारीख -
जब आ जाती है
महीने की पहली तारीख
होता है हाथों में पूरा वेतन
परन्तु फिर भी होती है एक चुनौती..

कम नहीं होता एक मिडिल क्लास की जिंदगी में महीने की पहली तारीख का महत्व जब दिमाग में घुमड़ रहा होता है हिसाब किताब पूरे महीने का!
जिंदगी में पहचान खोजती साधारण सी घटना को भी मुकेश जी ने कविताओं के माध्यम से मानवीय अहसास की पहचान दी है.. कहना गलत नहीं होगा कि हिम्मत है उनमें..
*कबूतर की ओट से उम्मीदों भरा एक टुकड़ा आसमान साथ ले आने की जो आज नहीं तो कल होगा इरादों में
और फिर वजूद होगा मेरा
मेरे हिस्से का आसमान!

कोई भी कविता यूही नहीं लिखी जाती किसी भी कवि की कविता के पीछे एक सोच, भाव और कहानी या कारण होता है!
एेसा ही यहाँ भी है  *हमिंग बर्ड *की हर कविता को पढते हुए मैंने महसूस किया है प्रत्येक कविता में वजह है वेवजह कुछ नहीं लिखा गया है!  हाथ की लकीरें, पगडंडी, शेर सुनाऊँ, मेरे अंदर का बच्चा.. क्या सोचता है अपनी ही बात कहती मुकेश जी की यह हुडदंगी कविता अच्छी लगी! 

कुल मिलाकर मुकेश कुमार सिन्हा जी की कवितायें भी हमिंग बर्ड की तरह ही उन्मुक्त हैं जो स
मय, सीमा और बंधन को न मान कर जीने और आगे बढ़ने की ख्वाहिश है कि पाले किसी भी दिशा में उड़ सकने के लिये तैयार हैं
हमिंग बर्ड के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं  के साथ..

कवि का छुटकू सा (पांच) मिली ग्राम का मन भविष्य में अपनी सृजनशीलता के साथ एक सफल कवि व लेखक की उपस्थिति दर्ज कराता रहे यही ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ!
दोस्तों.. हमिंग बर्ड की.. कुछ कविताओं के अंश चित्र रूप में आप सभी के लिए उपस्थित हैं.. आप भी पढ कर आनंद ले!
शुभकामनाओं के साथ 

मंगला रस्तोगी!

प्रवीण मालिक के हाथों में हमिंग बर्ड 

Wednesday, May 4, 2016

लघु प्रेम कथा - 14


आल इंडिया रडियो के ऑडिटोरियम से बिहार क्विज चैम्पियनशिप के रनर्स अप का अवार्ड लेकर लड़का मंच से अपने पेयर के साथ उतर रहा था यह सोचते हुए की - प्रिलिमीनरी से अब तक, करीबन 250 पेयर्स में दुसरे स्थान पर रहना !! बेहतर ही है !! काश वो बेहतरीन होता तो उसकी टीम "बोम्बशेल" विनर होती !!

साला! बजर राउंड में नीचे सामने बैठी उस लड़की पर नजर न अटकी होती तो बजर समय पर बजता !! काश, हाथ न कांपा होता !!

तभी, एकदम सामने से आती वही लड़की हाथ बढ़ाते हुए चहकी - व्हाट ए सुपर्ब जॉब डन बाय यू ! मार्वेलस!! वेल डन!!! कांग्रेट्स!!!!
(बाप रे! इत्ती सारी अंग्रेजी!! लड़का हकबकाया)

थैंक्स!!!! - इतना ही जबाब दे पाया वो भी हकलाते हुए ! नजर फिर अटकी! ऐसे लगा जैसे किसी ने खेल खेल में कहा हो - स्टेचू !!

उसे कहाँ इतनी समझ थी की फैन/फोलोवेर्स भी कुछ होते हैं !

छूटते ही, अपने क्विज पेअर को बता रहा था - देख यार ! वो तो मेरे पर मर मिटी !! मैं तो आज का चेम्पियन !!

आखिर लड़की जा रही थी
लड़के ने पीछे से धीरे से कहा -
यू आर सो ब्यूटी फुल !
दो ठिठकती नजर फिर से टकराई !!
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लड़का अपने पेयर को छोड़ कर लड़की के साथ फ्रेजर रोड के एक छोटे से रेस्टुरेंट में चाट और गुलाबजामुन खा रहा था !! :)




Friday, April 29, 2016

लघु प्रेम कथा 13

#लघुप्रेमकथा- 13
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एनएसयूआई द्वारा कॉलेज में आयोजित ब्लड डोनेशन कैंप !

पतले दुबले एनीमिक से विज्ञानं के एक छात्र ने भी जोश जोश में अपना नाम रजिस्टर किया ! आखिर इतनी सारी कॉलेज की लड़कियों से पीछे कैसे रहे !

धडकते दिल के साथ लम्बी झुकी हुई कुर्सी पर आँख बंद करके लेटा ही था कि

एक नर्स ने उसके बायीं बांह में टुर्निकेट (एक पतली प्लास्टिक की रस्सी) बाँधी ताकि नस उभर कर दिख जाए !

स्पर्श और सुगंध से चिंहुका - इस्सस !! इतनी खुबसूरत नर्स!! बेचारा उसके एप्रन व मुस्कराहट में ही खो गया! कहीं नर्स भी लिपिस्टिक लगाती है !!

कमीने हॉस्पिटल वालों और छात्र संघ वालों ने जानबूझ कर कॉलेज बॉयज का रक्त इकठ्ठा करने हेतु शायद खुबसुरती का सहारा लिया था !!

उफ़ ! उस सींकिया पहलवान की नस (वेन) भी नर्स की खुबसुरती में फड़क उठी !!

नर्स ने मोटी सी सुई चुभो दी !!

"उफ़! सिस्टर!!"

नहीं नहीं! सिस्टर कैसे कह सकता हूँ
दर्द को पीते हुए लड़का बुदबुदाया !
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एक बोतल खून निकल चुका था बिना किसी दर्द के!!


अब लड़का दूर रखे कुर्सी पर बैठ, ऑरेंज जूस पीते हुए निहार रहा था !! सिस्टर .... नही नहीं उसी नर्स को !!


अभिनव मीमांसा में रंजू भाटिया के कलम से हमिंग बर्ड





Monday, April 4, 2016

लघु प्रेम कथा - 12




देर रात, शायद अंतिम मेट्रो !
अनिमेष बैगपैक संभाले हलके थके क़दमों के साथ चढ़ता है!

आह, पूरा मेट्रो खाली बस दूर वाली सीट पर अकेली खुबसूरत भोली सी नवयुवती बैठी थी !

सधे क़दमों से गुनगुनाते हुए अनिमेष वहीँ पास पहुँच जाता है !

पल भर में होती हैं आँखे चार
एक जोड़ी खिलखिलाती हंसी व समय कटने लगता है !

गंतव्य के आने से पहले, नवयुवती पास आकर बिना कुछ कहें अनिमेष के बाहों में होती है

अनिमेष के लिए एक छोटा सा सफ़र ताजिंदगी याद रखने लायक लगता है !

मेट्रो के रुकते ही युवती स्माइल के साथ जा चुकी होती है !

धीरे-धीरे दरवाजा बंद हुआ, अनिमेष विस्सल करते हुए सेल पॉकेट से निकालना चाहता है !

इस्स्स्स्स्स्स!! सेल और वेलेट गायब हो चुका था!!
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एक बाहियात लप्रेक :-D
पर मेट्रो में 95% पकडे गये पॉकेटमार युवतियाँ ही होती हैं!!


तो सफ़र में अनिमेष न बनें :-D


Thursday, March 17, 2016

लघु प्रेम कथा - 11


कॉलेज के दिनों में कितने थेथर होते थे दोस्त !!
साले!! चेहरा देखकर व आवाज की लय सुनकर भांप जाते थे ! कुछ तो पंगे हैं !!

क्या हुआ? काहें मुंह लटकाए हुए हो रे !!
चाय के लिए नही पूछी क्या??
ओह तुम तो उसके साथ सिनेमा जाने वाले थे न!!
"लव  86" ..... ओ मिस !! मिस !! :-D
ओह हो !! बाबू को टिकट नही मिला !! बेचारा !!
बेवकूफ!! हमको बुला लेते, कैसे भी घुसवा ही देते हाल में !!
चल अब, बुरबक जइसन मुंह मत बनाओ !

अगले शुक्रवार को पहला शो मेरे तरफ से बालकोनी का, तुम दोनों के लिए !!
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साला ! एक पैसे की औकात नही, पर साथ खड़े रहते ! अम्बानी जैसे फीलिंग भर देते थे !!

मंजीत कनक व्यास के  हाथों  में  हमिंग बर्ड

Tuesday, March 1, 2016

लघु प्रेम कथा - 10


माचिस की तीली सररर्र !!
एक हलकी सी सांस ली अन्दर और बस सुलग गयी, होंठों से लगी, क्लासिक माइल्ड किंग साइज़ !!
जीरो वाट के जलते बल्ब को देखते हुए लड़के ने सांस छोड़ी तो धुएं को बल्ब की और रास्ता बनाते देखा!!
आड़ी तिरछी आकृतियाँ उभरी, कुछ काले मेघ जैसी , तो कुछ अनाम प्रिय या प्रियतमा जैसी !!
अरे कहीं वही तो नहीं !! मोटी!!!!
एक मन हुआ सारा धुंआ अन्दर ले लूं ! इसी बहाने वो भी अन्दर ही बस जायेगी, बेशक सिगरेट के धुंए के साथ ही सही !!
पर डब्बी पर नजर पड़ी तत्क्षण!!
स्मोकिंग इज इंजुरीयस टू हेल्थ!!
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तभी तो वो दूर है न !!
आखिर बेहतरी इसी में है !! - अजीब से ख्याल के साथ इस बार धुएं का छल्ला बनाया लड़के ने !!!


मेरे सपनो की सवारी है :-D